ब्लॉगसेतु

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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ॐ शान्तिः। कोई शब्द नहीं हैं...। बस...। अब बहुत हो चुका...।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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“अजी सुनती हो।”“हाँ जी, बोलिए!”“लगता है, आज भी कुछ पोस्ट नहीं कर पाउंगा।”“तो …!?”“तो…, ये कि मेरी गिनती एक आलसी, और अनियमित ब्लॉगर में होनी तय है…।”“क्यों? आप क्या खाली बैठे रहते हैं?”“नहीं ये बात नहीं है… लेकिन ब्लॉग मण्डली को इससे क्या? उसे तो हमारी हाजिरी चाहिए...
girish billore
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जागते रही समस्याओं से भागते रही ब्लाग पे ब्लॉग लादते रहिये जी हाँ अपने बलाग पे टिप्पणियों की आमदनी की चिंता छोड़ दूजों के ब्लॉग पे टिप्पणी दागते रहिए आपके ब्लॉग पे टिप्पणी ऐसे ही आएंगी आपके ब्लॉग की गरिमा बढाएगी आपके ब्लॉग को विश्व भर में ले जाएँगी . आभास दुनिया के...
 पोस्ट लेवल : ब्लॉगर ब्लॉग
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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मुझे आज वर्ष १९९९ में हुई अपनी शादी के बाद का अगला दिन याद आ गया, जब मैं ससुराल के आँगन में बैठा हुआ अपनी पत्नी की सहेलियों से घिरकर औपचारिक और अनौपचारिक परिचय के दौर को झेल रहा था। साले-सालियों और घर के अन्य सदस्यों से परिचय का दौर बीत चुका था। चुटकुलों और गीतों क...
girish billore
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वेबदुनिया पर मेरा ब्लॉग "सव्यसाची" पर पोस्ट उपलब्ध है आपके एक क्लिक की ज़रूरत है उत्साह वर्धन के लिए सादर गिरीश बिल्लोरे मुकुल जबलपुर
 पोस्ट लेवल : मेरे ब्लॉग.
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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मेरा बेटा ‘सत्यार्थ’ नाटक की तैयारी में [??:)]घर खाली है निपट अकेले पड़े हुए है।बीबी-बच्चे गाँव गये हैं, अड़े हुए हैं॥मस्त रहा ब्लॉगिंग में, सबने करली कुट्टी।विकट नतीजे लेकर आयी मेरी छुट्टी॥बिटिया ने जब छुट्टी का सन्देश सुनाया।नानी के घर जाने का अरमान बताया॥मैने सोच...
girish billore
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सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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(चित्र wordpress.com से साभार)ब्लॉगर महोदय पुस्तकालय गये, जाने कैसे किताबों की बात-चीत सुन ली; और झेंप मिटाने के लिए कुछ पुराने पृष्ठों को पलटना शुरू किया। लेकिन यह पन्ने पलटना भी बड़ा काम का साबित हुआ। बल्कि यूँ कहें कि इन्हें खजाना हाथ लग गया।वहाँ सरस्वती से मुलाक...
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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मेरी कल की पोस्ट में किताबों की बात-चीत के बीच-बीच में दिया हुआ उनका कोड क्रमांक शायद आपको परेशान कर रहा हो। मुझे तो कर ही रहा था। इसलिए सोचता हूँ, अगली कड़ी देने से पहले इसके बारे में थोड़ी चर्चा कर ली जाय।कम्प्यूटर के युग में पैदा होने वाले बच्चों को शायद यह अजूबा...
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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एक बड़े और भव्य पुस्तकालय में जाने का मेरा अनुभव पहला तो नही था; लेकिन जाने क्यों इस बार जब मैं इस पुस्तकालय में दाखिल हुआ तो मुझे बड़ी खुसर-फुसर और आपस में गड्ड-मड्ड होती आवाजें सुनायीं पड़ीं।मैने चारो ओर नजर दौड़ाई तो एक भी पुस्तक-प्रेमी या ज्ञान-पिपासु वहाँ मौजूद नह...