ब्लॉगसेतु

mahendra verma
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छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए इस मौसम में ‘ओल’ महत्वपूर्ण हो जाता है । रबी फसल के लिए खेत की जुताई-बुआई के पूर्व किसान यह अवश्य देखता है कि खेत में ओल की स्थ्ति क्या है । ओल मूलतः संस्कृत भाषा का शब्द है । विशेष बात यह है कि ओल का जो अर्थ संस्कृत में है ठीक वही अर्थ छ...
Basudeo Agarwal
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नन्दन कानन में स्मृतियों के, खोया खोया मैं रहता हूँ,अवचेतन के राग सुनाने, भावों में हर पल बहता हूँ,रहता सदा प्रतीक्षा रत मैं, कैसे नई प्रेरणा जागे,प्रेरित उससे हो भावों को, काव्य रूप में तब कहता हूँ।बहे काव्य धारा मन में नित, गोते जिसमें खूब लगाऊँ,दिव्य प्रेरणा का...
Madabhushi Rangraj  Iyengar
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 पोस्ट लेवल : त्रिभाषा हिंदी
Kavita Rawat
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Basudeo Agarwal
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भरा साहित्य सृजकों से हमारा ये सुखद परिवार,बड़े गुरुजन का आशीर्वाद अरु गुणग्राहियों का प्यार,यहाँ सम्यक समीक्षाओं से रचनाएँ परिष्कृत हों,कहाँ संभव कि ऐसे में किसी की कुंद पड़ जा धार।1222*4*********यहाँ काव्य की रोज बरसात होगी।कहीं भी न ऐसी करामात होगी।नहाओ सभी दोस्तो...
sanjiv verma salil
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                                                                  ॐ       ...
 पोस्ट लेवल : भाषा छंद काव्य लेख
sanjiv verma salil
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भारत का भाषा गीत आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'*हिंद और हिंदी की जय-जयकार करें हम भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम *भाषा सहोदरा होती है, हर प्राणी कीअक्षर-शब्द बसी छवि, शारद कल्याणी कीनाद-ताल, रस-छंद, व्याकरण शुद्ध सरलतमजो बोले वह लिखें-पढ़ें, विधि जगव...
 पोस्ट लेवल : भाषा गीत bhasha geet
sanjiv verma salil
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दोहा सलिला *सलिल धार दर्पण सदृश, दिखता अपना रूप।रंक रंक को देखता, भूप देखता भूप।।*स्नेह मिल रहा स्नेह को, अंतर अंतर पाल। अंतर्मन में हो दुखी, करता व्यर्थ बवाल।।*अंतर अंतर मिटाकर, जब होता है एक।अंतर्मन होत सुखी, जगता तभी विवेक।।*गुरु से गुर ले जान जो, वह पाता निज रा...
Kailash Sharma
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तुम संबल हो, तुम आशा हो,तुम जीवन की परिभाषा हो।शब्दों का कुछ अर्थ न होता,उन से जुड़ के तुम भाषा हो।जब भी गहन अँधेरा छाता,जुगनू बन देती आशा हो।जीवन मंजूषा की कुंजी,करती तुम दूर निराशा हो।नाम न हो चाहे रिश्ते का,मेरी जीवन अभिलाषा हो।...©कैलाश शर्मा
sanjiv verma salil
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कवित्त घनाक्षरी विविध भाषाओँ मेंलाख़ मतभेद रहें, पर मनभेद न हों, भाई को हमेशा गले, हँस के लगाइए|लात मार दूर करें, दशमुख सा अनुज, शत्रुओं को न्योत घर, कभी भी न लाइए|भाई नहीं दुश्मन जो, इंच भर भूमि न दें, नारि-अपमान कर, नाश न बुलाइए|छल-छद्म, दाँव-पेंच, दन्द-फंद अपना...