ब्लॉगसेतु

रवीन्द्र  सिंह  यादव
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 1. जलती बस्ती~ खड़ा है लावारिस संतरा-ठेला। 2. शहरी दंगा~ एक सौ पचास है दूध का भाव। 3. संध्या की लाली~क्षत-विक्षत लाश चौपाल पर। 4. अर्द्ध-यामिनी~ जलते घरोंदों में इंसानी शव। 5. भोर...
Sanjay  Grover
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क्या तुम अच्छा गा सकते हो ?गाकर भीड़ लगा सकते हो ?भीड़ को सम्मोहित करके तुमक्या नारा लगवा सकते हो ?भीड़ तालियां भीड़ ही थप्पड़-ख़ुदको यह समझा सकते हो ?अब तक जो होता आया हैक्या फिर से करवा सकते हो ?तुमसे क्या अब बात छुपाना- क्या तुम घर पर आ सकते हो ?अपने दिल की बात...
Sanjay  Grover
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मज़े की बात है कि जब प्रशंसा में तालियां बजतीं हैं तब आदमी नहीं देखता कि तालियां बजानेवालों की भीड़ कैसे लोंगों के मिलने से बनी है !? उसमें पॉकेटमार हैं कि ब्लैकमेलर हैं कि हत्यारे हैं कि बलात्कारी हैं कि नपुंसक हैं कि बेईमान हैं कि.......लेकिन जैसे ही इसका उल्टा कुछ...
Sanjay  Grover
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मैं शायद उस वक़्त दसवीं या बारहवीं में होऊंगा जब पहली बार स्थानीय आर्य समाज के डेरे पर एक प्रसिद्ध महात्मा की कथा सुनने गया। वहां मैंने पहली बार रिशी दयानंद की चूहे वाली कथा सुनी और काफ़ी प्रभावित हुआ। मेरी सोच और व्यवहार वैसे भी दूसरों से आसानी से नहीं मिलते थे शाय...
पम्मी सिंह
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भीड़ तंत्र पर बात चली है बेरोजगार भटके युवकों की राह बदली हैआह,वाह..अना,.अलम के खातिर हुजूम की खूब चली हैदर -ओ -दम निकाल कर  शान्ति की राह निकली हैतमाम शहर भी आँखों पर कतरन बाँध डाली हैबिसात किसी और की चंद लोगों को मोहरा बनाने की बात चली हैकलम भी तेरी...
Sanjay  Grover
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photo by Sanjay Groverग़ज़लभीड़, तन्हा को जब डराती हैमेरी तो हंसी छूट जाती हैसब ग़लत हैं तो हम सही क्यों होंभीड़ को ऐसी अदा भाती हैदिन में इस फ़िक़्र में हूं जागा हुआरात में नींद नहीं आती हैभीड़, तन्हा से करती है नफ़रतऔर हक़ प्यार पे जताती हैएक मुर्दा कहीं से ले आओभीड़ तो पी...
Sanjay  Grover
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ग़ज़लराज़ खुल जाने के डर में कभी रहा ही नहींकिसीसे, बात छुपाओ, कभी कहा ही नहींमैंने वो बात कही भीड़ जिससे डरती हैये कोई जुर्म है कि भीड़ से डरा ही नहीं !जितना ख़ुश होता हूं मैं सच्ची बात को कहकेउतना ख़ुश और किसी बात पर हुआ ही नहींकिसीने ज़ात से जोड़ा, किसीने मज़हब से...
Sanjay  Grover
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PHOTO by Sanjay Groverवे अकेले पड़ गए थे।कोई समाज था जो उन्हें स्वीकार नहीं रहा था।कोई भीड़ थी जो उनके खि़लाफ़ थी।कोई समुदाय था जो उन्हें जीने नहीं दे रहा था।कोई व्यवस्था थी जो उनसे नफ़रत करती थी।कोई बेईमानी थी जिसने उनके खि़लाफ़ साजिश रची थी।मैंने बस थोड़ी-सी मदद कर दी...
मधुलिका पटेल
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यह जीवन जब भीड़ में गुम हो जाने के बाद धीरे - धीरे तन्हा होता है धीरे - धीरे पंखुड़ियों से सूख कर बिखर जाते हैं यह रिश्ते प्यार स्नेह और अपनेपन की टूट जाती है माला धीरे - धीरे हर मन का गिरता जाता है धीरे - धीरे कम हो जाता...
Sanjay  Grover
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एक समय की बात है एक अजीब-सी जगह पर, बलात्कार करनेवाले, बलात्कृत होनेवाले, बलात्कार देखनेवाले, बलात्कार का इरादा रखनेवाले सब मिल-जुलकर रहते थे। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); बीच-बीच में वे न जाने किसका विरोध और शिक़ायत करते रहते थे।शायद क...