ब्लॉगसेतु

Bhavana Lalwani
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भूख सबको लगती है, इंसान हो या जानवर, कोई इस प्राकृतिक आवशयकता से परे नहीं है  ..ऐसा इस नश्वर संसार में कोई  नहीं हो सकता जो कहे कि मुझे भूख नहीं लगती...और फिर हमारे देश में तो पितरों को भी साल में एक भोजन करवाया जाता है (हाँ उनके नाम पर पंडित और ब्राह्मण...
Sanjay Chourasia
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कल जब मैं बस से जा रही थी कौलेजतब बस पर आया , तोंदू बच्चा एक बिलकुल मटके जैसा था , उसका पेट दिखाकर जिसको , उसने माँगा रुपया एक मैंने कहा " दर्द और व्यंग्य " से तुम्हें दिया यह किसने , काम नेक गिड़गिडाकर बोला " माई " बाप नहीं घर में , मेहताई है भूखे पेट !लगा जैसे वह...
 पोस्ट लेवल : रुपया भूख पेट प्रश्न
विजय राजबली माथुर
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हिंदुस्तान,लखनऊ,19-08-2011 हिंदुस्तान,लखनऊ,05 -12-2011 हिंदुस्तान,लखनऊ,19-08-2011 हिंदुस्तान,लखनऊ 05 दिसंबर 2011 के अंक मे दिल्ली मे 04 दिसंबर 2011,रविवार को  अन्ना टीम की केजरीवाल/किरण बेदी द्वारा निकाली वाहन रैली का  फोटो छ्पा है। इसमे स्...
विजय राजबली माथुर
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सन 1991 मे राजनीतिक परिस्थितिए कुछ इस प्रकार तेजी से मुड़ी कि हमारे लेख जो एक अंक मे एक से अधिक संख्या मे 'सप्त दिवा साप्ताहिक',आगरा के प्रधान संपादक छाप देते थे उन्हें उनके फाइनेंसर्स जो फासिस्ट  समर्थक थे ने मेरे लेखों मे संशोधन करने को कहा। मैंने अपने लेखों...
पत्रकार रमेश कुमार जैन उर्फ निर्भीक
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वहीं आदर्श जीवन है वही सच्चा जैन-जीवन है, जिसके कण-कण और क्षण-क्षण में धर्म की साधना झलकती हो. धर्ममय जीवन के आदर्शों का यह भव्य चित्र प्रस्तुत है-'जैन जीवन' में.1. जैन भूख से कम खाता है. जैन बहुत कम बोलता है. जैन व्यर्थ नहीं हंसता है. जैन बडो की आज्ञा मानता है. जै...
विजय राजबली माथुर
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श्रीमती पूनम माथुर हमार भईय्या जब रेल से घरे आवत रहलन तब ट्रेन में उनकर साथी लोगन कहलन कि हमनी के त बहुत तरक्की कर ले ले बानी सन.आज हमनी के देश त आजादी के बाद बहुत प्रगतिशील हो गइल बा.पहिले के जमाना में त घोडा गाडी ,बैल गाडी में लोग सफर करत रहलन लेकिन अब त पूरा मही...
Deen Dayal Singh
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भूख की कविताभूख पर नहीं लिखी जा सकती कोई सुंदर सी कविता दरअसल बेहद डरावना है भूख का चेहरा हम में से कई लोग भूखे रहते हैं कई बार इसलिए की सुधर सखे सेहत लेकिनजिन लोगों की सेहतबिलबिलाती भूख से नहीं रहती दुरुस्त सोचिये जारा एक पल, कितना भयानक होता ह...
ललित शर्मा
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पाँव के छाले ही, रहे मेरी खातिर,पाँव के छाले ही, रहे मेरी खातिर,सूखे निवाले ही, रहे मेरी खातिर।फ़ूलों की सेज पे, सोते हैं रहनुमाटाट के बिछौने ही, रहे मेरी खातिर।ज्म्मुहुरियत के दावे, उनने खूब किएपर फटे पैजामे ही, रहे मेरी खातिर।भूखे पेट ही, खुश रहने की सोची,नश्तर ब...