ब्लॉगसेतु

रवीन्द्र  सिंह  यादव
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फ़ासले क़ुर्बतों में बदलेंगे एक रोज़, होने नहीं देंगे हम इंसानियत को ज़मी-दोज़। फ़ासले पैदा करना तो सियासत की रिवायत है,अदब को आज तक अपनी ज़ुबाँ की आदत है। आग बाहर तो दिखती है अंदर भी&nbs...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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विकास में पिछड़े तो आत्महीनताघर कर गयी विमर्श में पतन हुआ तो बदलाभाव और हिंसा मन में समा गयी  भूमंडलीकरण के मुक्त बाज़ार ने इच्छाओं के काले घने बादल अवसरवादिता की कठोर ज़मीन तैयार की सामाजिक मूल्यों कीनाज़ुक ज...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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भिखारी  बनाने पर तुला  है  पूँजीवाद, सिसकियाँ   भर  रहा   है  समाजवाद। इतिहास के नाज़ुक  मोड़  पर खड़े  होकर    हम भूमंडलीकरण  को  कोस  रहे  हैं,  देख  भ...
Ashok Kumar
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 समीर अमीन की दो किताबों - 'द वर्ल्ड वी विश टू सी' और  'फ्राम कैपिटलिज्म टु सिविलाइजेशन' के बहाने वरिष्ठ कहानीकार तथा गंभीर अध्येता रमेश उपाध्याय ने पूँजीवाद के वर्चस्व जमाते जाने के साथ आये भूमंडलीय परिवर्तनों का मानीखेज़ अध्ययन किया है. यह लेख भारत भारद...