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Ravindra Pandey
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किसको सुनाऊँ, अज़ब दास्तां,सूना है तुम बिन, ये सारा जहां।रुँधा गला है, और आँखें हैं नम,मुस्कुराने की मैंने, ली है कसम,समय चल रहा है, हवा बह रही,ठहर सा गया हूँ, एक मैं ही माँ।सुना है तुम बिन...कसक हैं कई पर सुनाऊँ किसे,ये पाँवों के छाले दिखाऊँ किसे,बिखर जो गया, समेटे...
PRABHAT KUMAR
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मेरा हौंसला बढ़ाया था उस वक्त जब मैं हार गया था किसी प्रतियोगिता मेंआज तक भूला नहीं वह चाॅकलेटयही उपहार था तुम्हारे शब्दों में मेरे लिये मेरी प्रतिभा कापरन्तु वह उपहार थामेरे साहस और परिचय काखुद स्वआकलन करने का खुद सेमैं भूला नही उस भीड़ कोजिस भीड़ में मै...