ब्लॉगसेतु

सुशील बाकलीवाल
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      जान लीजिये कि मकर संक्रान्ति पर्व अब 15 जनवरी को क्यों आने लगा है ?  जबकि यह वर्ष 2080 तक अब हर वर्ष 15 जनवरी को ही आता रहेगा । विगत 72 वर्षों से प्रति वर्ष मकर संक्रांति हम ...
PRAVEEN GUPTA
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ये लेख मैं बहुत दिनों से लिखना चाह रहा था, पर लिख नहीं पाया था. हमारा समाज बहुत बड़ा हैं, करीब २० करोड़ के आसपास जनंसख्या होगी. इनमे अधिकतर तो वैश्य जातिया ही हैं, वे जातिया भी हैं, जो हैं तो वैश्य पर आजकल वे अपने आप को क्षत्रिय बताने लगी हैं.  हमारा वैश्य समाज...
विजय राजबली माथुर
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* घोषित रूप से नेतृत्व खुद को नास्तिक - एथीस्ट कहता है जिस कारण जनता का समर्थन पार्टी को नहीं मिलता है लेकिन ब्राह्मण वादी कामरेड्स खुद तांत्रिक प्रक्रियाओं का सहारा लेकर पार्टी पर अपना नियंत्रण बनाए रख कर पार्टी को न तो जन- प्रिय होने देते हैं न ही संगठन का व...
देवेन्द्र पाण्डेय
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सुबह उठा तो देखा-एक मच्छर मच्छरदानी के भीतर! मेरा खून पीकर मोटाया हुआ,करिया लाल। तुरत मारने के लिए हाथ उठाया तो ठहर गया। रात भर का साफ़ हाथ सुबह अपने ही खून से गन्दा हो, यह अच्छी बात नहीं। सोचा, उड़ा दूँ। मगर वो खून पीकर इतना भारी हो चूका था क़ि गिरकर बिस्तर पर बैठ गय...
PRABHAT KUMAR
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मेरा भ्रम था, मेरा सच बोलनामेरा भ्रम था, कुछ अपना होनामेरा भ्रम है अब खुद का होनामेरा भ्रम है तुम्हारा होनामेरा भ्रम है फिर भी है जीनाबिन भ्रम कुछ नहीं है पानाबस चलते जाना, चलते जाना.....ठीक वैसे जैसे कस्तूरी मृगठीक वैसे जैसे मृग तृष्णाठीक वैसे जैसे चाँद में जानवरठ...
 पोस्ट लेवल : कविता मेरा भ्रम था
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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चंदा सुनेगा आज फिरमेरी वही कहानीभूलती नहीं कभीलगती बड़ी सुहानी।दोहराता है ये मनहै अजीब-सी लगनपूनम की रात आयीनूर-ए-चश्म लायीधरती पर चंदा नेधवल चाँदनी बिखरायी चमन-चमन खिला थामन बहार से मिला थाकली-कली पर ग़ज़ब शबाब थायायावर भ्रमर मनुहार से मिला थाहवा का रुख़ प्य...
sanjiv verma salil
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दोहा सलिला*[भ्रमर दोहा- २६ वर्ण, ४ लघु, २२ गुरु]मात्राएँ हों दीर्घ ही,  दोहा में बाईसभौंरे की गुंजार से, हो भौंरी को टीस *फैलुं फैलुं फायलुं, फैलुं फैलुं फायचोखा दोहा भ्रामरी, गुं-गुं-गुं गुंजाय*श्वासें श्वासों में समा, दो हो पूरा काज, मेरी ही तो हो...
Sanjay  Grover
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लघुकथावह हमारे घरों, दुकानों, दिलों और दिमाग़ों में छुपी बैठी थी और हम उसे जंतर-मंतर और रामलीला ग्राउंड में ढूंढ रहे थे।-संजय ग्रोवर05-02-2017
Yashoda Agrawal
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उस देश के लोग बहुत धार्मिक थे. उन दिनों गौ रक्षा को लेकर देश में धार्मिक उन्माद बहुत उफान पर था. पिछले दिनों देश के एक प्रदेश में कुछ व्यक्तियों को इसलिए सरेआम डण्डों से मारा-पीटा गया, क्योंकि वह गाय की खाल उतार रहे थे. मरे हुए जानवरों की खाल निकालना उनका पुश्...
 पोस्ट लेवल : राकेश भ्रमर रचनाकार
रविशंकर श्रीवास्तव
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