ब्लॉगसेतु

Yashoda Agrawal
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रंगों का मौसम पतंगों का मौसम तिल-गुड़ की सौंधी मिठास का मौसम लो शुरू हुआ नया साल  ।१।मौसम का मिज़ाज बदलाहवा का अन्दाज़ और बदली सूर्य की...
Yashoda Agrawal
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हाँमैं प्रवासी हूँशायद इसी लिएजानता हूँकि मेरे देश कीमाटी मेंउगते हैं रिश्ते*बढ़ते हैंप्यार की धूप मेंजिन्हें बाँध करहम साथ ले जाते हैंधरोहर की तरहऔर पोसते हैं उनकोकलेजे से लगाकर*क्योंकि घर के बाहरहमें धन, वैभव,यश और सम्मानसब मिलता है,नहीं मिलती तोरिश्तों कीवो गुड़...
Yashoda Agrawal
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आज रात चाँदज़रा देर सेखिड़की पर आयाथा भी कुछ अनमना सापूछा .... तो कुछ बोला नहींशायद उसने सुना नहींया फिर अनसुनी कीराम जाने....लेकिन ये तो तय हैथा उदास, चेहरा भीकुछ पीला पीला सा ही लगायूँ ही थोड़ी देरइधर उधर पहलू बदलतेबादलों की ओट मेंछुपते छुपातेन जाने कबचुपके से नी...
Yashoda Agrawal
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वह पूरे परिवार की जिंदगी का ताना बाना होती है घर भर के दुःख दर्द आँसू हँसी मुस्कान और रिश्ते... सब उसके आँचल की गांठ से बंधे उसकी डिग्री या बिना डिग्री वाली मगर गजब की स्किल्स के आस पास  जीवन की आंच में धीरे धीरे पकते रह...
Yashoda Agrawal
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हवाओं की..  कोई सरहद नहीं होतीये तो सबकी हैं बेलौस बहा करती हैं**हवाएँ हैं, ये कब किसी से डरती हैंजहाँ भी चाहें बेख़ौफ़ चला करती हैं**चाहो तो कोशिश कर के देख लो मगरबड़ी ज़िद्दी हैं कहाँ किसी की सुनती हैं**हवाएँ न हों तो क़ायनात चल नहीं सकती इन्ही की इनायत...
Yashoda Agrawal
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अक्सर सोचती हूँ... तुम्हे शब्दों में समेट लूँ या फिरबाँध दूँ ग़ज़ल में न हो तो ढाल दूँ गीत के स्वरों में ही मगर कहाँ हो पाता है तुम तो समय की तरह फिसल जाते हो मुट्ठी से...- मंजू मिश्रामूल रचना 
Yashoda Agrawal
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आज तुम इतनी बड़ी हो गयी हो कि मुझे तुम से सर उठा कर बात करनी पड़ती हैसच कहूं तो बहुत फ़ख्र महसूस करती हूँ जब तुम्हारे और मेरे रोल और सन्दर्भ बदले हुए देखती हूँ आज तुम्हारा हाथमेरे कांधे पर और कद थोड़ा निकलता हुआ&nbs...
Yashoda Agrawal
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ये गूंगी मूर्तियाँजब से बोलने लगी हैंन जाने कितनों कीसत्ता डोलने लगी हैजुबान खोली हैतो सज़ा भी भुगतेंगीअब छुप छुपा कर नहींसरे आम...खुली सड़क परहोगा इनका मान मर्दनकलजुगी कौरवों की सभासिर्फ ठहाके ही नहीं लगाएगीबल्कि वीडियो भी बनाएगीअपमान और दर्द की इन्तहा मेंये मूर्त...
Yashoda Agrawal
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काट दिये पर  सिल दी गयीं जुबानें और आँखों पर पट्टी भी बाँध दीइस सबके बाद दे दी हाथ में कलम कि लो अब लिखो निष्पक्ष हो कर तुम्हारा फैसला जो भी हो बेझिझक लिखना -:-  गूंगे बहरे लाचार आपके रहमो करम पर जिन्दा लोग क्य...
Yashoda Agrawal
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काश कि हम लौट सकें अपनी उन्ही जड़ों की ओर जहाँ जीवन शुरू होता था  परम्पराओं के साथ और फलता फूलता था  रिश्तों  के साथ **मधुर मधुर मद्धम मद्धम  पकता था  अपनेपन की आंच में  मैं-मैं और-और की भूख से परे&nb...