ब्लॉगसेतु

दीपक कुमार  भानरे
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( इमेज गूगल साभार )#कोरोना वायरस की रोकथाम में ,कुछ दिन तो गुजारें  अपने घर मकान में ।  मिला है मौका इस नेक काम में , कुछ दिन तो गुजारें  अपने घर जहान में ।  होती थी शिकायत सबकी जुबान में ,  घर से बाहर रहते हो हमेशा काम में ,नहीं समय घर के...
 पोस्ट लेवल : कोरोना मकान makan Corona घर ghar
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देश की जनता होशियार -डा श्याम गुप्त                            देश की जनता होशियार ------एक -- राष्ट्र बचे या हम रोटी कपड़ा मकान में लगे रहें ----========================बिके हुए, भटके हुए, भ्रमित...
सुशील बाकलीवाल
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          चर्चगेट, मुंबई से मेरे घर से काम पर जाने के लिये लोकल ट्रेन की यह रोज़मर्रा की यात्रा थी । मैंने सुबह ६.५० की लोकल पकड़ी थी । ट्रेन मरीन लाईन्स से छूटने ही वाली थी कि एक समोसे वाला अपनी ख़ाली टोकरी के साथ ट्रेन...
girish billore
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 पोस्ट लेवल : पुश्तैनी मकान
Kajal Kumar
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वह गांव से शहर आया था, कुछ छोटा-मोटा काम खोजता हुआ. शुरू-शुरू में ख़र्चा बांट कर किसी के साथ रहने लगा. उधर, किसी पक्की नौकरी की कोशिश भी करता रहा. एक दिन, एक बड़े कारखाने में बात बन ही गर्इ, नौकरी पक्की तो नहीं थी पर यह पता चला कि...
 पोस्ट लेवल : मकान home House घर children बच्चे
केवल राम
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आज सोच रहा हूँ बीते हुए कल के विषय में उलझ रहा हूँ भविष्य की योजनाओं में खाका खींच रहा हूँ आने वाले दिन की गतिविधियों काद्वंद्व है मन में भूत और भविष्य का. सोच रहा हूँ इनसान की फितरत के बारे मेंकहानी याद कर रहा हूँ आज तक के उसके सफर की समझ रहा हूँ उसकी भविष्य की यो...
सुशील बाकलीवाल
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           इन  सूत्रों को पढ़ने के बाद पता चला कि सचमुच खुशहाल ज़िंदगी और शानदार मौत के लिए ये सूत्र बहुत ज़रूरी हैं...                ...
मधुलिका पटेल
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तुम मेरी नज़मो के मुसाफ़िर बन गए हो आते जाते चंद मुलाकात होती रहती है पर अब धीरे-धीरे तुमने उस ज़मी को हथिया लिया है और इक खूबसूरत सा मकानबना लिया है नज़मों की गलियों में जब तुम नहीं होते बहुत ख़ामोशी सी छाई रहती है लफ्जों के दरमियाँ अब नज़्म चाहती है तुम्हारी रौनके लगी...
rishabh shukla
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जब माँ के नर्म हांथो का हुआ था स्पर्श,रोम-रोम खिल उठा मेरा,बहूत खुश हुआ था मैं|जब भी किसी की डाट मिली,हमेशा मेरे सामने दीवार सी अडिग,हमेशा दुलारा, पुचकारा मुझे,बहूत खुश हुआ था मैं||जब पापा का हाँथ सर पर पड़ा,लगा जैसे मुझे हिम्मत मिल गयी,जब उंगली पकड़कर हिम्मत से चल...
rishabh shukla
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आम आदमी के होते,ज्यादा से ज्यादा तीन अरमान ।दो वक्त की रोटी, तन भर कपड़ा,और हो अपना एक मकान ॥दो वक्त की रोटी के लिए,दर-दर ढूढे कुछ भी काम ।कठिन परिश्रम और मेहनत से,फिर भी सेठ सुना  देता फरमान ॥सुना के मालिक सारे काम,वो जाता अपने धाम ।करदे सारे काम सभी,लेकिन फिर...