ब्लॉगसेतु

mahendra verma
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क्या आपको किसी ने कभी कहा है कि ‘ज़रा खुले दिमाग़ से सोचो’ या क्या यही बात आपने किसी से कभी कही है ?  इस बात से ऐसा लगता है कि सोचने वाला अब तक ‘बंद दिमाग़’ से सोच रहा था । क्या बंद दिमाग़ से भी सोचा जा सकता है ? सोचते होंगे कुछ लोग ! तभी तो कहने की ज़़रूरत पड़ी कि...
kumarendra singh sengar
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आज कुछ लिखने का मन नहीं हो रहा था किन्तु कल से ही दिमाग में, दिल में ऐसी उथल-पुथल मची हुई थी, जिसका निदान सिर्फ लिखने से ही हो सकता है. असल में अब डायरी लिखना बहुत लम्बे समय से बंद कर दिया है. बचपन में बाबा जी द्वारा ये आदत डाली गई थी, जो समय के साथ परिपक्व होती रह...
विजय राजबली माथुर
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 विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की इस स्वीकारोक्ति पर कि..."बालाकोट हमले में न कोई पाकिस्तानी सैनिक मरा, न कोई नागरिक"...अमित शाह को कोई शर्म महसूस नहीं होगी न उन चैनलों को कोई लाज आने वाली है जो 350 को मारने की खबरों के शोर से आसमान सिर पर उठाए थे।Hemant Kumar Jha...
mahendra verma
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यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति यदा-कदा अनेक कारणों से झूठ बोलता है किंतु जब यह किसी व्यक्ति के लिए आदत या लत बन जाती है तो समाज में वह निंदा का पात्र बन जाता है । कोई भी व्यक्ति नहीं चाहता कि कोई उसे झूठ बोलकर धोखा दे । आदतन झूठा वह आदमी होता हे जो पहले भी झूठ बोलता...
 पोस्ट लेवल : झूठ सच मनोविज्ञान
mahendra verma
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आजकल टेलीविज़न के चैनलों में भविष्यफल या भाग्य बताने वाले कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है । स्क्रीन पर विचि़त्र वेषभूषा में राशिफल या लोगों की समस्याओं के समाधान बताते ये लोग भविष्यवक्ता कहे जाते हैं । क्या ये सचमुच भविष्य की घटनाओं को पहले से जान लेते हैं ? क्या इनके...
कुमार मुकुल
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सहज बुद्धि के आधार पर मन पर नियंत्राण रखना ही जीवन का सबसे बड़ा अर्थ है। एडलर लिखते हैं कि ``जीवन का अर्थ है, मैं अपने साथी मनुष्यों में दिलचस्पी लूं, सम्पूर्ण का एक अंश बनूं, मानव-मात्र की भलाई के लिए अपना कर्तव्य-भाग निबाहूं।´´ वे मानते हैं कि दुनिया के सभ...
mahendra verma
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एक वाक्य में अंधविश्वास को परिभाषित करना मुश्किल है क्योंकि इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है । मोटे तौर पर कह सकते हैं कि ‘तर्कहीन विश्वास’ अंधविश्वास है । अपने विकास क्रम में जब मनुष्य थोड़ा सोचने-समझने लायक हुआ तब ज्ञान और तर्क का जन्म नहीं हुआ था । इन के अभाव में घटना...
kumarendra singh sengar
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गणितीय नियमों के अनुसार दो ऋण मिलकर भले ही धन बना देते हों मगर जीवन में एक भी ऋण परेशानी पैदा कर देता है। यहाँ ऋण का तात्पर्य किसी तरह के आर्थिक क़र्ज़ लेने से नहीं वरन सोच में, कार्य में, रहन-सहन में, बातचीत में आती जा रही नकारात्मकता से है। वर्तमान में समाज में बहु...
kumarendra singh sengar
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लोगों से मिलने-मिलाने के क्रम में, जानकारियों, सूचनाओं का आदान-प्रदान करने के दौरान, पढ़ने-लिखने के शौक में अक्सर देखने में आता है कि लोगों को जीवन के बारे में दार्शनिक रूप में अपनी राय रखने में बड़ा ही आनंद आता है. ऐसे लोगों का अपनी जीवन-शैली को लेकर, अपने जीवन-निर्...
Sanjay  Grover
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लड़के को मैं भली-भांति जानता था, इसलिए उसके भोलेपन और मासूमियत का मुझे अंदाज़ा था। तबियत भी ख़राब रहती थी उसकी, लेकिन वो रसोई के काम बिना किसी मेल ईगो को बीच में लाए कर देता था। उसकी ऐसी ईगो दूसरे कुछ मामलों में ज़रुर देखने को मिलती थी। उसकी बहिनों के ब्वॉय-फ्रेंडस् थ...