ब्लॉगसेतु

Ravindra Pandey
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मौसम ज़रा ज़र्द हो क्या गया,वो हम से ही नज़रें चुराने लगे।कल तक रहे धड़कनों की तरह,साये से भी पीछा छुड़ाने लगे।काँच से भी नाज़ुक अरमां मेरे,टूटते ही लहू सब बहाने लगे।शुक्र है तुम्हें सम्भलना आ गया,हम आँखों से मोती गिराने लगे।तनहा कटे क्यों उमर का सफ़र,यादों की महफ़िल सजाने...
Ravindra Pandey
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सब तोड़ के तिलिस्म ज़माने के चली आ,वादे किए जो हमने  निभाने को चली आ...अब आ भी जा सूनी है ज़िन्दगी तेरे बग़ैर,बेशक मुझे तू  छोड़ के जाने को चली आ...सांसें  हुई  बोझिल  ये  धड़कने  गवाह हैं,रूठे हुए से दिल को  मनाने  को चली आ.....
mahendra verma
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                 जाने -पहचाने  बरसों के  फिर  भी   वे अनजान लगे,                 महफ़िल सजी हुई है लेकिन सहरा सा सुन...
Ravindra Pandey
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यकीं है मिलेंगे ख़्वाबों में हम तुम,मग़र बेकरारी में, नीदें कहाँ हैं..?तुम्हीं से रौशन है मेरी ये दुनिया,तुम्हीं से खुशियों का कारवां है...भले दूर हो तुम, जेहन में हो मेरे,जैसे धरती के संग आसमां है...फूलों में, खुशबू में, हो तुम हवा में,तुम्हीं से यारा, ये दिलकश समां...
DHRUV SINGH  "एकलव्य"
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                                                                          ...
नवीन "राज" N.K.C
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आदत- सी है चोट खाने की,हैरत नहीं !दिल के बिखर जाने की। है नाज़ुक मिज़ाज दिल दरिया कराहता है कलेजा पिघलता है दर्द जब ढूंढते है महफ़िल किसी के -खुशियों में मुस्कुराने की। मुद्दत से यूँ ही भटकते जश्न ए महफ़िल में अश्क़ों को गिराने की ,अब तो रवायत बनी है ग़म के मोतियों को ख़...
 पोस्ट लेवल : ढूंढते है महफ़िल !
विनय प्रजापति
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शायिर: अमीर अशरफ़ ख़ाँ 'हसरत' (खतौली)सरमाया-ए-हयात1 मुझे कुछ मिला तो हैमहफूज़ मुफ़लिसी में भी मेरी अना2 तो हैहमदर्द बनके आना अचानक मेरे क़रीबदर पर्दा इस ख़ुलूस3 में कोई दग़ा तो हैदुश्मन है सारा शहर तो इसका नहीं मलाल4मेरी मदद के वास्ते मेरा ख़ुदा तो हैहमदर्दियाँ नहीं तो...