--दरक़ती जा रही हैं नींव, अब पुख़्ता ठिकानों कीतभी तो बढ़ गयी है माँग छोटे आशियानों की--जिन्हें वो देखते कलतक, हिक़ारत की नज़र से थेउन्हीं के शीश पर छत, छा रहे हैं शामियानों की--बहुत अभिमान था उनको, कबीलों की विरासत परहुई हालत बहुत खस्ता, घ...