ब्लॉगसेतु

kumarendra singh sengar
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अक्सर मन में सवाल उठा करते हैं कि व्यक्ति आपस में सम्बन्ध क्यों बनाता है? आपस में दोस्ती जैसी स्थितियों की सम्भावना वह क्यों तलाशता है? क्यों दो विपरीतलिंगी आपस में प्रेम करने लग जाते हैं? क्या ऐसा होना प्राकृतिक है? क्या ऐसा मानवीय स्वभाव की आवश्यकता के चलते किया...
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विश्वास और अविश्वास के बीच एक अक्षर का अंतर है मगर दोनों की प्रकृति में जमीन आसमान का अंतर है. विश्वास के द्वारा व्यक्ति अपनी प्रस्थिति को मजबूत बना पाता है वहीं अविश्वास के कारण उसके व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. विश्वास और अविश्वास के बीच के बारीक अंतर...
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बुन्देलखण्ड के लोक आयोजन में टेसू और झिंझिया का खेल बच्चों द्वारा खेला जाता है. आश्विन शुक्ल अष्टमी से शरद पूर्णिमा तक टेसू तथा नवमी से चतुर्दशी तक झिंझिया खेली जाती है. टेसू का खेल बालकों द्वारा तथा झिंझिया का खेल बालिकाओं द्वारा खेला जाता है. बाँस की तीन डंडियों...
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आज दोपहर फिर खूब बारिश हुई, खूब जोरों की बारिश हुई. सभी की तरह हमारा भी मन किया भीगने का, झमाझम बरसती बारिश में दिल तक भिगो डालने का. ठीक उसी तरह भीगने का जैसे कि और लोग भी भीगा करते हैं. कभी सड़क पर झूमते हुए, कभी खाली गीली सड़क पर अपनी बाइक लहराते हुए, कभी तेज बरसत...
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हिन्दी दिवस के बाद हिन्दी की बात करना चर्चा करना कुछ लोगों को ऐसे महसूस होता है जैसे जन्मदिन गुजर जाने के बाद जन्मदिन की बधाई देना. जन्मदिन पर बधाई देना और लेना हमें व्यक्तिगत रूप से कभी पसंद नहीं आया. अब इसे एक तरह की सामाजिक परंपरा कहें या फिर अपने लोगों के बीच ह...
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ख़ुशी की चाह सबको है मगर उसे पाने का, तलाशने का तरीका बहुत से लोगों को पता ही नहीं. पहली बात तो ये कि अभी बहुत से लोगों को इसका ही पता नहीं कि ख़ुशी आखिर है क्या? उन्हें तो इसका भी भान नहीं कि उनके लिए ख़ुशी क्या है? ऐसे लोग बस दूसरे के चेहरे की प्रसन्नता को, उसकी भौत...
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अपने ब्लॉग के सहारे आप सभी से जुड़ने का प्रयास हमेशा से रहा है. ब्लॉग के दिन ऐसा लगता है जैसे किसी अन्य माध्यम ने छीन लिए. हमें याद है जब हम ब्लॉग जगत में एकदम से नए-नए आये थे तब किसी भी तरह की सहायता मांगने पर वरिष्ठ ब्लॉगर द्वारा तत्कालीन सहायता उपलब्ध कराई जाती थ...
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बहुत बार ऐसा होता है जबकि बिना किसी व्यस्तता के भी व्यस्तता समझ आती है. समझ नहीं आता कि चौबीस घंटे का समय कहाँ, कैसे निकल जाता है. दिन भर के क्रियाकलापों पर नजर डाली जाये तो कुछ भी ऐसा समझ नहीं आता है कि महसूस हो कि अति-व्यस्त रहने वाला काम किया है. इसके बाद भी ऐसा...
 पोस्ट लेवल : ब्लॉग-लेखन मानसिकता
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सोशल मीडिया पर जिस दौर में हमारा आना हुआ था तब लोगों ने बताया-समझाया था कि यहाँ बौद्धिक चर्चा होती है, आपसी विमर्श होता है. बहुतेरे लोगों ने हमारे पढ़ने-लिखने के शौक को देखते हुए बताया था कि इसके माध्यम से अच्छा पढ़ने को मिलेगा और उससे लिखने में सहायता मिलेगी. शुरुआत...
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ज़िन्दगी और जीवन भले ही देखने-सुनने में एक जैसे समझ आते हों मगर दोनों के स्वभाव में, प्रवृत्ति में बहुत बारीक सा अंतर है. इस बारे में दार्शनिक रूप में बहुत कुछ कहा जा सकता है, बहुत कुछ लिखा जा सकता है, बहुत कुछ बताया जा सकता है. इसके बाद भी असलियत बहुत बारीक सी रेखा...