ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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तो साहिबान हम चलते हैं। फ़िर कब मिलेंगे, पता नहीं। मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी  वाला निदा फ़ाजली का शेर याद आ रहा है। उसे लिख भी दूँ, तब भी नहीं मिलेंगे। क्या करूँ? मन भी तो खाली होना चाहता है। इस जगह ने सारी खाली जगहें अपने नाम से रख ली हैं। कोई और बात...
Shachinder Arya
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कभी लगता है, एक दिन ऐसा भी होगा जब यहाँ लिखा हुआ एक-एक शब्द कभी किसी के समझ में नहीं आएगा। जैसे मुझे अभी से नहीं आ रहा। यहाँ की लगती गयी तस्वीरें इन सालों में जितनी ठोस, मूर्त, स्पष्ट हुई हैं, उसी अनुपात में सत्य उतना ही धुँधला, अधूरा, खुरदरा होकर मेरे भीतर घूम रहा...
Shachinder Arya
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तीसरी मंज़िल। सबसे ऊपर। इसके ऊपर आसमान। आसमान में तारे। अँधेरे का इंतज़ार करते। इंतज़ार चीलों के नीचे आने तक। वह वहाँ तब नहीं देख पाती, चमगादड़ों की तरह। इन्हे आँख नहीं होती देखने के लिए। वह तब भी नहीं छू जाते कभी किसी पत्ते को भी। हरे-हरे पत्ते। तुम्हारे गाल की तरह म...
Shachinder Arya
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मेरी बस थोड़ी-सी आँखें जल रही हैं और थोड़ी-सी नींद गायब है। बाकी सब ठीक है, जैसे देश में सब ठीक है। इस व्यंजना को समझने के लिए जादा दिमाग लगाने और घोड़े दौड़ाने की ज़रूरत नहीं है। यह कोई फ़िलर पोस्ट नहीं है जो इतने दिन के बाद आज रात उस खाली स्थान को भरने की गरज से लिखी ज...
Shachinder Arya
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मैं कभी कुछ नहीं बोलूँगा, बस चुप रहूँगा। आप जब कुछ कहेंगे, तब मैं कुछ नहीं कहूँगा। आप देखने को कहेंगे, मैं बिलकुल नहीं देखुंगा। आपकी सहजता को असहजता में नहीं बदलने दूँगा। आप सहज रहें इसलिए खुद ही असहज होता रहूँगा। कुछ बोलने से पहले कुछ नहीं बोलूँगा। आपके लिए अपना...
Shachinder Arya
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पता नहीं कभी-कभी क्या होता है, हम चाहकर भी नहीं समझ पाते। शायद तभी उन बीत गए दिनों में लौट कर उन्हें दुरुस्त करने की ज़िद से भर जाते होंगे। अगर ऐसा न होता तब मुझे भी हलफ़नामे की तरह दोबारा उन बातों पर गौर करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सोचता हूँ, अगर मेरे मन में वह ख़याल दो...
Shachinder Arya
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यह तस्वीर जिस वक़्त की है, तब घड़ी पाँच बजकर बाईस मिनट पर स्थिर है और मदन कश्यप अपनी कविता ‘ढपोरशंख’ सुना रहे हैं। मुझे भी आए हुए काफ़ी देर हो चुकी है। शायद एक डेढ़ घंटे से खड़ा हूँ। खड़े-खड़े कमर में दर्द जैसा था, पर लौटने का मन नहीं था। देवेश से पहले समर मुझे वहीं एक कं...
Shachinder Arya
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गुरु: पुनीत जी आपकी इस किताब पर मैंने जनसत्ता में लिखा था। वह भी खरीद कर। इस पर लिखी गई बेहद कम समीक्षाओं में एक वह भी। लेकिन हम जैसे हिंदी के मामूली लेखक आपको याद नहीं रहते। हिंदी के लेखक में ग्लैमर नहीं होता न। लेकिन दुर्भाग्य से आप भी उसी ग्लैमरहीन भाषा के लेखक...
Shachinder Arya
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बिलकुल अभी, सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सोच रहा था, कितना अच्छा होता, मैं इस दुनिया के किसी भी देश का नागरिक न होता। पर इस सोचने के साथ ही एक पल में मैंने न केवल राष्ट्र-राज्य के राजनैतिक इतिहास को ख़ारिज कर दिया अपितु इसकी किसी भी तरह से हताश दिखने वाली टिप्पणी में उन सारी पर...
Shachinder Arya
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मैं मूलतः इंसान हूँ। इसलिए थोड़ा विचलित हूँ। थोड़ा दुखी भी हूँ शायद। मेरे पास कहने के लिए कुछ ख़ास नहीं है। पर कभी-कभी कहना ज़रूरी लगता है। जैसे आज।मुझे नहीं पता, आततायी कैसे होते हैं। उनकी शक्लें शायद हमारी तरह ही होती होंगी। लेकिन वह असहिष्णु होते होंगे। उनके पास शाय...