ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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यह तस्वीर जिस वक़्त की है, तब घड़ी पाँच बजकर बाईस मिनट पर स्थिर है और मदन कश्यप अपनी कविता ‘ढपोरशंख’ सुना रहे हैं। मुझे भी आए हुए काफ़ी देर हो चुकी है। शायद एक डेढ़ घंटे से खड़ा हूँ। खड़े-खड़े कमर में दर्द जैसा था, पर लौटने का मन नहीं था। देवेश से पहले समर मुझे वहीं एक कं...
Shachinder Arya
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बड़े दिनों से यह सारे सवाल अंदर-ही-अंदर उमड़ते रहे हैं। कहीं कोई जवाब दिखाई नहीं देता। उन सबका होना हमारे होने के लिए पता नहीं कितना ज़रूरी है? पर यह समझना मुश्किल है कि इधर नींद न आने का असली कारण क्या है? शायद हमें अपनी पहचान छिपाये रखनी है। कोई हमें देख न ले, हम कौ...
Shachinder Arya
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लिखने का मन नहीं है। फ़िर भी अगर आ गया हूँ तो कोई न कोई बात तो होगी। बात है ही कुछ ऐसी। वरना सच में टाल जाता। तो शुरू कर रहा हूँ। शायद तुम इस तक बहुत दिन बाद पहुँचो। पर आज सुबह जनसत्ता में तुम्हारा लिखा पढ़कर थोड़ा उदास हो गया। सोचने लगा, इसमे मैं कहाँ हूँ? फ़िर स...
Shachinder Arya
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हमें ऐसा क्यों लगता है के हम गलत जगह पर हैं। क्यों लगता रहा है हम जिस क़ाबिल हैं वहाँ कभी पहुँच ही नहीं पाये। जैसे अभी। 'अभी' काल विशेष में होना है। जहाँ हमारी बढ़ती उमर लगातार हमें तोड़ रही होती है। हम जहाँ हैं वहाँ से कई साल पहले हमें नौकरी वाला हो जाना चाहिए था। ले...
Shachinder Arya
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हम लोग इंतज़ार कर रहे थे शायद ऐसे ही किसी दिन का । ऐसी ही मुलाक़ात का। राकेश इस बार दस दिन लिए दिल्ली आया। दिवाली के दो दिन पहले। पर बे-तक्कलुफ़ होकर उस इत्मीनान से अपने-अपने हिस्से कभी खोल ही नहीं पाये। एक दूसरे से कुछ कह नहीं पाये थे। तय हुआ सब इस शनिवार इकट्ठे हो र...