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sanjiv verma salil
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मुक्तिका*मैं समय हूँ, सत्य बोलूँगा.जो छिपा है राज खोलूँगा.*अनतुले अब तक रहे हैं जोबिना हिचके उन्हें तोलूँगा.*कालिया है नाग काला धननाच फन पर नहीं डोलूँगा.*रूपए नकली हैं गरल उसकोमिटा, अमृत आज घोलूँगा*कमीशनखोरी न बच पाएमिटाकर मैं हाथ धो लूँगा*क्यों अकेली रहे सच्चाई?सत...
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sanjiv verma salil
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मुक्तिकाआपकी मर्जी*आपकी मर्जी नमन लें या न लेंआपकी मर्जी नहीं तो हम चलें*आपकी मर्जी हुई रोका हमेंआपकी मर्जी हँसीं, दीपक जलें*आपकी मर्जी न फर्जी जानतेआपकी मर्जी सुबह सूरज ढलें*आपकी मर्जी दिया दिल तोड़ फिरआपकी मर्जी बनें दर्जी सिलें*आपकी मर्जी हँसा दे हँसी कोआपकी मर्ज...
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sanjiv verma salil
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मुक्तिकाबिन सपनों को सोना क्याबिन आँसू के रोना क्या*वह मुस्काई, मुझे लगा करती जादू-टोना क्या*नहीं वफा जिसमें उसकीखातिर नयन भिगोना क्या*दाने चार न चाँवल केमूषक तके भगोना क्या*सेठ जमीनें हड़प रहेजानें फसलें बोना क्या*http://divyanarmada.blogspot.in/
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मुक्तिका:संजीव *याद जिसकी भुलाना मुश्किल है याद उसको न आना मुश्किल है.मौत औरों को देना है आसांमौत को झेल पाना मुश्किल है.खुद को कहता रहा मसीहा जोउसका इंसान होना मुश्किल है.तुमने बोले हैं झूठ सौ-सौ परएक सच बोल सकना मुश्किल है.अपने अधिकार चाहते हैं सभीगैर क...
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sanjiv verma salil
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मुक्तिका:संजीव *कैसा लगता काल बताओ? तनिक मौत को गले लगाओ.मारा है बहुतों को तड़पातड़प-तड़पकर मारे जाओ.सलमानों के अरमानों कीचिता आप ही आप जलाओ.समय न माफ़ करेगा तुमकोकाम देश के अगर न आओ.दहशतगर्दों तज बंदूकेंचलो खेत में फसल उगाओ***३१-७-२०१५salil.sanjiv@gmail.comh...
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मुक्तिका:क्यों है?संजीव 'सलिल'*जो जवां है तो पिलपिला क्यों है?बोल तो लब तेरा सिला क्यों है?दिल से दिल जब कभी न मिल पाया.हाथ से हाथ फिर मिला क्यों है?नींव ही जिसकी रिश्वतों ने रखी.ऐसा जम्हूरियत किला क्यों है?चोर करता है सीनाजोरी तोहमको खुद खुद से ही गिला क्यों है?शू...
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वरिष्ठ ग़ज़लकार प्राण शर्मा, लंदन के प्रति भावांजलि संजीव *फूँक देते हैं ग़ज़ल में प्राण अक्सर प्राण जी क्या कहें किस तरह रचते हैं ग़ज़ल सम्प्राण जीज़िन्दगी के तजुर्बों को ढाल देते शब्द मेंसिर्फ लफ़्फ़ाज़ी कभी करते नहीं हैं प्राण जीसादगी से बात कहने में न...
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दोहाःछूट गया क्यों हाथ से, श्वासों का संतूरप्यासी आसें रह गयीं, मन्जिल भी है दूर..मुक्तिका:बिटियासंजीव 'सलिल'**चाह रहा था जग बेटा पर अनचाहे ही पाई बिटिया.अपनों को अपनापन देकर, बनती रही पराई बिटिया..कदम-कदम पर प्रतिबंधों के अनुबंधों से संबंधों मेंभैया जैसा लाड़-प्या...
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मुक्तिका *कल दिया था, आज लेता मैं सहारा चल रहा हूँ, नहीं अब तक तनिक हारा सांस जब तक, आस तब तक रहे बाकी जाऊँगा हँस, ईश ने जब भी पुकारा देह निर्बल पर सबल मन, हौसला है चल पड़ा हूँ, लक्ष्य भूलूँ? ना गवारा पाँव हैं कमजोर तो बल हाथ का ले...
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अंगिका दोहा मुक्तिकासंजीव*काल बुलैले केकर, होतै कौन हलाल?मौन अराधें दैव कै, एतै प्रातःकाल..*मौज मनैतै रात-दिन, हो लै की कंगाल.संग न आवै छाँह भी, आगे कौन हवाल?*एक-एक कै खींचतै, बाल- पकड़ लै खाल.नींन नै आवै रात भर, पलकें करैं सवाल..*कौन हमर रच्छा करै, मन में 'सलिल' मल...