मुण्डकोपनिषद १परा सत्य अव्यक्त जो, अपरा वह जो व्यक्त।ग्राह्य परा-अपरा, नहीं कहें किसी को त्यक्त।।परा पुरुष अपरा प्रकृति, दोनों भिन्न-अभिन्न।जो जाने वह लीन हो, अनजाना है खिन्न।। जो विदेह है देह में, उसे सकें हम जान।भव सागर अज्ञान है, अक्षर जो वह ज्ञान।। मन इंद्रिय अ...