ब्लॉगसेतु

शिवम् मिश्रा
19
सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। मैथिलीशरण गुप्त (अंग्रेज़ी: Maithili Sharan Gupt, जन्म- 3 अगस्त, 1886, झाँसी; मृत्यु- 12 दिसंबर, 1964, झाँसी) खड़ी बोली के प्रथम महत्वपूर्ण कवि थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से आपने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाय...
kuldeep thakur
92
मृषा मृत्यु का भय हैजीवन की ही जय है ।जीव की जड़ जमा रहा हैनित नव वैभव कमा रहा हैयह आत्मा अक्षय हैजीवन की ही जय है।नया जन्म ही जग पाता हैमरण मूढ़-सा रह जाता हैएक बीज सौ उपजाता हैसृष्टा बड़ा सदय हैजीवन की ही जय है।जीवन पर सौ बार मरूँ मैंक्या इस धन को गाड़ धरूँ मैंयद...
Yashoda Agrawal
236
पुण्यतिथिआज बारह दिसम्बरचारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,मानों झीम[1] रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,जि...
Yashoda Agrawal
236
1886 -1964विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये¸नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे¸वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।उसी उदार की कथा सरस्वती ब...
kumarendra singh sengar
28
आज राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी का जन्मदिन है. उनका जन्म 03 अगस्त 1886 को चिरगाँव (झाँसी) उत्तर प्रदेश में हुआ था. उनके पिता का नाम सेठ रामचरण और माता का नाम श्रीमती काशीबाई था. इनके पिता कनकलता उपनाम से कविता करते थे और राम के विष्णुत्व में अटल आस्था रखते थे. गुप...
शिवम् मिश्रा
19
नमस्कार मित्रो,आज राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी का जन्मदिन है. उनका जन्म 03 अगस्त 1886 को चिरगाँव (झाँसी) उत्तर प्रदेश में हुआ था. उनके पिता का नाम सेठ रामचरण और माता का नाम श्रीमती काशीबाई था. इनके पिता कनकलता उपनाम से कविता करते थे और राम के विष्णुत्व में अटल आस्...
शिवम् मिश्रा
19
सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।मैथिलीशरण गुप्त जी का जन्म 3 अगस्त 1886 चिरगाँव,झाँसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। संभ्रांत वैश्य परिवार में जन्मे मैथिलीशरण गुप्त के पिता का नाम 'सेठ रामचरण' और माताका नाम 'श्रीमती काशीबाई' था। पिता रामचरण एक निष्ठावान प्रसिद्ध...
YASHVARDHAN SRIVASTAV
525
मैथिलीशरण गुप्त फिर आ गई दिवाली की हंसती हुई यह शाम रोशन हुए चिराग खुशी का लिए पयाम। यह फैलती निखरती हुई रोशनी की धार उम्मीद के चमन पे यह छायी हुई बहार। यह जिंदगी के रुख पे मचलती हुई दुल्हन घूंघट में जैसे कोई लजायी हुई दुल्हन। शाय...