ब्लॉगसेतु

अनीता सैनी
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 उस मोड़ पर जहाँ  टूटने लगता है बदन छूटने लगता है हाथ देह और दुनिया से उस वक़्त उन कुछ ही पलों में उमड़ पड़ता है सैलाब यादों का  उस बवंडर में तैरते नज़र आते हैं अनुभव बटोही की तरह ...
Kailash Sharma
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गीला कर गयाआँगन फिर से,सह न पायाबोझ अश्क़ों का,बरस गया।****बहुत भारी हैबोझ अनकहे शब्दों का,ख्वाहिशों की लाश की तरह।****एक लफ्ज़जो खो गया था,मिला आजतेरे जाने के बाद।****रोज जाता हूँ उस मोड़ पर जहां हम बिछुड़े थे कभी अपने अपने मौन के साथ,लेकिन रोज टूट जाता स्वप्नथामने से...
Kailash Sharma
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मत बांटो ज़िंदगीदिन, महीनों व सालों में,पास है केवल यह पलजियो यह लम्हाएक उम्र की तरह।****रिस गयी अश्क़ों मेंरिश्तों की हरारत,ढो रहे हैं कंधों परबोझ बेज़ान रिश्तों का।****एक मौनएक अनिर्णयएक गलत मोड़कर देता सृजितएक श्रंखलाअवांछित परिणामों की,भोगते जिन्हें अनचाहेजीवन पर्य...
Yash Rawat
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(c) बंजर हो चुके खेत खलिहानअपना लेख शुरु करने से पहले मैं संक्षेप में अलग उत्‍तराखंड राज्‍य बनाने के लिए हुए आंदोलनों और आंदोलनकारियों पर हुए जुल्‍मों की संक्षिप्‍त जानकारी देना चाहूंगा।        1 सितम्बर, 1994 को उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का काल...
VMWTeam Bharat
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जुड़ते -टूटते धागों ने ,जलते बुझते आगों ने ,बनते बिगड़ते रागों ने ,समाज के विषधर नागों नेपद-निशान को किसने मोड़ दियापथ " निशान " का किसने मोड़ दिया ||१पकड़ते छूटते हाथों नेमिलते बिछड़ते साथों नेबनती बिगडती बातों नेमुंह मांगी सौगातों नेपद-निशान को किसने मोड़ दियापथ " निशान...
Kailash Sharma
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    (1)चहरे पर जीवन केउलझी पगडंडियांउलझा कर रख देतींजीवन के हर पल को,जीवन की संध्या मेंझुर्रियों की गहराई मेंढूँढता हूँ वह पलजो छोड़ गये निशानीबन कर पगडंडी चहरे पर।    (2) होता नहीं विस्मृतछोड़ा था हाथज़िंदगी केजिस मोड़ पर।ठहरा है यादों का...
ललित शर्मा
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PRABHAT KUMAR
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कि विपत्ति धीरज का रुख मोड़ कर लद नही जाती खुले आसमान में तूफ़ान कभी असर नहीं दिखाती गगनचुम्बी इमारतो को हवाए जब चाहे तब गिरा दे-गूगल साभार मगर बिना सीखे कोई परीक्षा सफल हो नहीं पातीकि मधुमक्खियाँ भी आजकल शत्रु को पहचानती है हाथ लगाने पर आक्रामक हो ढूंढ ढूंढ कर...
Kailash Sharma
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एक दिन तो मिलें,कुछ क़दम तो चलें।राह कब एक हैं,मोड़ तक तो चलें।साथ जितना मिले,कुछ न सपने पलें।राह कितनी कठिन,अश्क़ पर क्यूँ ढलें।भूल सब ही गिले,आज़ फ़िर से मिलें।...©कैलाश शर्मा 
Sandhya Sharma
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सुना है नहीं रहेगा गली के कोने काबिजली का खंभाजिससे टिककर खड़ीअपलक निहारती थी माँससुराल जाते हुए मुझेजब तक गली कामोड़ ना आ जाएमैं अब भी देखती हूँ उसेहर बार आते वक़्ततब तक.....मोड़ ना आ जायेजबकि अब माँउससे टिकी नहीं होतीआज जाने मुझेक्यों ऐसा लग रहा हैजैसे मुझसे मेरा कोई...
 पोस्ट लेवल : रास्ते माँ ससुराल मोड़