ब्लॉगसेतु

जेन्नी  शबनम
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उधार   *******   कुछ रंग जो मेरे हिस्से में नहीं थे   मैंने उधार लिए मौसम से   पर न जाने क्यों ये बेपरवाह मौसम मुझसे लड़ रहा है   और माँग रहा है अपना उधार वापस   जिसे मैंने खर्च दिया उन दिनों   ज...
 पोस्ट लेवल : मौसम उम्मीद ज़िन्दगी
ऋता शेखर 'मधु'
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ग्रीष्म ऋतु ============ ग्रीष्म की दुपहरिया कोयल की कूक से टूट गयी काँच सी छत पर के पँखेसर्र सर्र नाच रहेहाथों में प्रेमचंदनैंनों से बाँच रहेनिर्मला की हिचकियाँ दिल में हैं खाँच सी कोलतार पर खड़े झुंड हैं मजूरों के द्वार पर नाच रहे बानर जमूरों के लू की बड़ी तपन खस...
 पोस्ट लेवल : नवगीत मौसम
jaikrishnarai tushar
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चित्र-साभार गूगलएक गीत-मौसम का बासीपन टूटेहँसनाहल्की आँख दबाकरमौसम का बासीपन टूटे ।हलद पुतीगोरी हथेलियोंसे अब कोई रंग न छूटे ।भ्रमरों केमधु गुँजन वालेआँगन में चाँदनी रात हो,रिश्तों मेंगुदगुदी समेटेबच्चों जैसी चुहुल,बात हो,अर्घ्य जलेतुलसी चौरे परकोई मंगल कलश न फूटे...
E & E Group
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मिर्च का अचार आवश्यक सामग्री - Ingredients for Instant Mirchi Achar Recipeहरी मिर्च- 100 ग्रामसरसों का तेल- 4 से 5 छोटी चम्मचसिरका- 4 छोटी चम्मचसौंफ- 3 छोटी चम्मचकाली सरसों के दाने- 3 छोटी चम्मचनमक- 1.5 छोटी चम्मच या स्वादानुसारमेथी दाने- 1.5 छोटी चम्मचजी...
sanjiv verma salil
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नवगीत *पल में बारिश, पल में गर्मी गिरगिट सम रंग बदलता है यह मौसम हमको छलता है*खुशियों के ख्वाब दिखाता हैबहलाता है, भरमाता हैकमसिन कलियों की चाह जगासौ काँटे चुभा, खिजाता हैअपना होकर भी छाती परबेरहम! दाल दल हँसता हैयह मौसम हमको छलता है*जब एक हाथ म...
 पोस्ट लेवल : navgeet mausam नवगीत मौसम
Ravindra Pandey
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जो भी हो जाए कम है,क्यों तेरी आँखें नम हैं?देते हैं  ज़ख्म  अपनें,मिले गैरां से मरहम है।तू अपनी राह चला चल,पीकर अपमान हलाहल।या मोड़ दिशा हवाओं के,गर तुझमें भी कुछ दम है।न्याय सिसक कर रोए,अन्याय की करनी धोए.यहाँ झूठ, फ़रेब के क़िस्से,नित लहराते परचम हैं।नैतिकत...
kumarendra singh sengar
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यूँ तो सभी मौसमों का अपना मजा है. हर मौसम में लोग अपनी तरह से उसका आनंद लिया करते हैं. किसी को गर्मी इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि इस मौसम में वे देश-विदेश के बर्फीले स्थानों के भ्रमण का बहाना निकाल लेते हैं. कुछ लोगों को सर्दी इसलिए पसंद आती है क्योंकि उस मौसम का गु...
sanjiv verma salil
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एक रचना:पौधा पेड़ बनाओ*काटे वृक्ष, पहाडी खोदी, खो दी है हरियाली.बदरी चली गयी बिन बरसे, जैसे गगरी खाली.*खा ली किसने रेत नदी की, लूटे नेह किनारे?पूछ रही मन-शांति, रहूँ मैं किसके कहो सहारे?*किसने कितना दर्द सहा रे!, कौन बताए पीड़ा?नेता के महलों में करता है, विकास क्यों...
jaikrishnarai tushar
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चित्र -गूगल से साभार एक पेमगीत -कुछ फूलों के  कुछ मौसम के कुछ फूलों के कुछ मौसम के रंग नहीं अनगिन |तुम्हे देखकर बदला करतीं उपमाएं पल -छिन |एक सुवासित गन्ध हवा में छूकर तुमको  आती ,राग बदलकर रंग बदलकर प्रकृ...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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कहीं बादल रहे उमड़कहीं आँधी रही घुमड़अब आ गयी धूप चुभती चिलचिलातीअब सूखे कंठ से चिड़िया गीत न गातीकोयल को तो मिल गया आमों से लकदक  बाग़कौआ ढूँढ़ रहा है मटका गाता फिरे बेसुरा रागचैतभर काटी फ़सल  बैसाख में खलिहान बदला ...