ब्लॉगसेतु

ऋता शेखर 'मधु'
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521रबी खरीफनक्षत्रों का हो ज्ञानतूर की खान520तपता मृगरोहिणी भी बरसेधान हरसे519कृष्ण दशमीआषाढ़ की रोपनीधान बाहुल्य518खेत की माटीअनगिन गोड़ाईऊख सरस517चना की खोंटमकई की निराईरंग ले आई516बीज की मात्राप्रति बीघे में गेहूँपाँच पसेरी515खेत ऊर्वरनाइट्रोजन वृद्धिदालों की खे...
Kheteswar Boravat
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sanjiv verma salil
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नवगीत*पल में बारिश,पल में गर्मीगिरगिट सम रंग बदलता हैयह मौसम हमको छलता है*खुशियों के ख्वाब दिखाता हैबहलाता है, भरमाता हैकमसिन कलियों की चाह जगासौ काँटे चुभा, खिजाता है अपना होकर भी छाती परबेरहम! दाल दल हँसता हैयह मौसम हमको छलता है*जब एक हाथ में कुछ देतादूसरे ह...
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मित्रों...!गर्मी अपने पूरे यौवन पर है।ऐसे में मेरी यह बालरचना आपको जरूर सुकून देगी!पिकनिक करने का मन आया!मोटर में सबको बैठाया!!पहुँच गये जब नदी किनारे!खरबूजे के खेत निहारे!!ककड़ी, खीरा और तरबूजे!कच्चे-पक्के थे खरबूजे!!प्राची, किट्टू और प्रांजल!करते थ...
Kajal Kumar
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सुनील  सजल
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व्यंग्य – मुट्ठी गरम करने का मौसम साल बीतने को आया | यानि दिसम्बर आ गया | कडाके की सरदी वाले दिन | पानी जमा देने वाली सरदी | कांपते व सूखे में धरती से दरार मारते हाथ-पांव | ‘’ ग्लोबल वार्मिंग ‘ के ताने-बाने के बीच भी धूप में जैसे गरमाहट ही नहीं |उन्होंने भी कैलेण्ड...
सुनील  सजल
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   व्यंग्य- मौसम का दौर इस वर्ष मौसम का अजीब दौर चल रहा है |उनकी समझ के बाहर | वे परेशान है |अभी तक शरद का असर न के बराबर |ऐसा वे महसूस कर रहे हैं |शरद का मौसम और शरद का अता – पता नहीं |दिन गरमी , रात में मामूली ठंडक |वे बोले –‘’का बात है भैया इस बार ठण्ड...
Bhavana Lalwani
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दिन गुज़रते हैं फिर भी वक़्त थमा  हुआ सा है.ये एक अजीब मौसम है, इसमें दिन और रात का हिसाब आपस में गड्डमड्ड सा हो गया है. यहां उत्तरी ध्रुव की लम्बी रौशनियों वाली रातें भी हैं और  महासागर  के अथाह विस्तार जैसे  अनंत तक पसरे हुए दिन भ...
mahendra verma
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हरियाली ने कहा देख लो  मेरी यारी कुछ दिन और,सहना होगा फिर उस मौसम की मक्कारी कुछ दिन और ।बाँस थामकर  नाच रहा था  छोटा बच्चा रस्सी पर,दिखलाएगा वही तमाशा वही मदारी कुछ दिन और ।हर मंजि़ल का सीधा-सादा रस्ता नहीं हुआ करता,टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी से कर लो यारी...
mahendra verma
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कभी छलकती रहती थीं  बूँदें अमृत की धरती पर,दहशत का जंगल उग आया कैसे अपनी धरती पर ।सभी मुसाफिर  इस सराय के  आते-जाते रहते हैं,आस नहीं मरती लोगों की बस जीने की  धरती पर ।ममतामयी प्रकृति को चिंता है अपनी संततियों की,सबके लिए जुटा कर रक्खा दाना -पा...