ब्लॉगसेतु

सतीश सक्सेना
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समय प्रदूषित लेकर आये , क्या दोगे ?कालचक्र विकराल,तुम मुझे क्या दोगे ? दैत्य , शेर , सम्राट   ऐंठ कर , चले गए !शक्तिपुरुष बलवानगर्व कर  चले गए ! मैं हूँ प्रकृति प्रवाह, तुम मुझे क्या दोगे ?  हँसता काल विशाल,तुम मुझे क्या दोगे ?मै...
डा.राजेंद्र तेला निरंतर
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मौसम के मानिंद रिश्तों का रक्तचाप भी निरंतर झूले सा झूलता रहता है कभी घटता कभी बढ़ता तो कभी सामान्य हो जाता है झुंझलाहट मेंक्रोध में तनाव मेंबढ़ जाता है ख़ुशी में,सोहाद्र में  मिल जुल कर हँसने से  सामान्य हो जाता हैअपनों की पीड़ा दुविधा को देख कर दर्द की अनुभ...
राजेंद्र  गुप्ता
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अरुण कुमार निगम
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(१) कहाँ बदला है मौसम............. पिसते  हरदम ही  रहे, मन में  पाले टीस तुझको भी मौका मिला, तू भी ले अब पीस तू भी ले अब पीस , बना कर  खा ले रोटी   हम  चालों के बीच , सदा चौसर की गोटी पूछ  रहा  विश्वास , कहाँ ...
jaikrishnarai tushar
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चित्र -गूगल से साभार एक गीत -इस रक्तरंजित सुबह का मौसम बदलना इस रक्त रंजित सुब्ह का मौसम बदलना |या गगन में सूर्य कल फिर मत निकलना |द्रौपदी हर शाख पर लटकी हुई है ,दृष्टि फिर धृतराष्ट्र की भटकी हुई है ,भीष्म का भी&nbs...
Sandhya Sharma
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आई बरखा गूँजने लगा बूंदों का संगीत भीगने लगा अलसाया मौसम पहली फुहार के स्वागत को आतुर पंख पसारे मन मयूर धुल गई पत्ती-पत्ती खिल गई डाली-डाली कोरी धरती पर लिखने वाली है फिर से हरियाली .....
सतीश सक्सेना
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इंतज़ार है ! क्षितिज में कबसे, काले घने, बादलों का !पृथ्वी, मानव को सिखलाये,सबक जमीं पर रहने का ! गर्म  हवा के लगे, थपेड़े, वृक्ष न मिलते राही  को ,लकड़ी काट उजाड़े जंगल अब न रहे ,सुस्ताने को !ऐसे बिन पानी, छाया के, सीना जलता जननी  का...
अविनाश वाचस्पति
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ऋता शेखर 'मधु'
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पतझर के बाद बसंत...फिर तपती गर्मी...थोड़ी देर हो गई पतझर के हाइगा बनाने में...आइए देखते हैं पतझर के हाइकुओं को हाइगा की नजर सेचित्र गूगल से साभार
ऋता शेखर 'मधु'
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253समीर संगदौड़ते सूखे  पत्तेखो के अस्तित्व|252पत्तों को झाड़पतझर रचतावन श्रृंगार251पत्रविहीनठूँठ तरु के साएबेजान हुए|250आ जाना प्रियभेज रही हूँ पातीपीले पत्रों पे|249उड़ के चलेपतझर के पत्तेदेस पिया के|248विकल बनदेखता पतझरप्रेमी बसंत|247चुप न रहेंचर मर करतेपत्...
 पोस्ट लेवल : पतझड़ मौसम हाइकु