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विजय राजबली माथुर
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   ~विजय राजबली माथुर ©
विजय राजबली माथुर
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 यह मंटो की आत्मकथा है जिसमें बीच-बीच में कहानियों को पिरोया गया है।फोटो साभार : नई दुनिया Publish Date:Fri, 21 Sep 2018 04:20 PM (IST)Movie Review: बहुत दिलचस्प है ‘मंटो’ की यह दास्तांसआदत हसन मंटो एक ऐसे दीवाने का नाम जिसने बेबुनियाद उम्मीद पर अपने कहान...
Dr. Mohd. Arshad Khan
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गर्मी अपने यौवन पर थी। सूरज से जैसे आग बरस रही थी। लू के थपेड़ों से धरती तवा बनी हुई थी। धूल के बवंडर रह-रहकर आसमान को मटमैला कर देते थे। शहर की ओर जानेवाली सड़क पर दूर-दूर तक सन्नाटा छाया हुआ था। मास्टर छोटेलाल पाकड़ के पेड़ के नीचे खड़े बस का इंतज़ार कर रहे...
नवीन "राज" N.K.C
301
मंज़िल ऐसी चुनो कीहर मुराद पूरी हो जायेख़्वाब ऐसे देखोजो हक़ीक़त संवर जाये ,इश्क़ के नाव सेउम्र रहते उतरना बेहतरफिर न ढूँढ पाओगेज़िंदगी के तूफानों में मुकद्दर ,बड़ी लज़ीज़ लगती हैएक उम्र में ये एहसासजो डूब गए इस पैमाने मेंतो लिजलिजी है हर सांस ,खुद को ढूँढने में गुजारोबेहतर...
 पोस्ट लेवल : यथार्थ
नवीन "राज" N.K.C
301
ज़िंदगी के केनवस पर इरेज़र हर जगह काम नहीं आते हैं कुछ गलतियों को मिटा नहीं पाते कुछ दर्द भूला नहीं पाते कुछ ज़ख़्म सुख कर भी भीतर रिसते हैं कुछ बातें अरसा गुजर गया पर अचानक उभर आते हैं यादें उम्र गुजरने के बाद भी फिर से जवा...
 पोस्ट लेवल : यथार्थ
ANITA LAGURI (ANU)
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तुम कवि हो ना,शब्दों  को आकारदेते हो,मैं  एक कड़वा  सच  हूँ सच को नंगा करना मेरी  आत्मसंतुष्टि  है ।तुम्हारे  विचारों के प्रबल वेग का कोई छोर नहीं ।और मैं ...... गंतव्य का भटका राही,तलाश-ए- मंज़िल ...
सुमन कपूर
315
                               आभासी दुनिया का साभासी सच                                जो दीखता है वो हो...
 पोस्ट लेवल : यथार्थ साभासी आभासी
नवीन "राज" N.K.C
301
तुम्हारे लड़खड़ाते थरथराते शब्द जब कानों से सीने तक पहुँचती है दिल दहल जाता है,तुम्हारे काँपते हाथ बड़ी तकलीफ़ से उठते हुए जब माथे को छूती है भावनायें हिलौरें मारने लगती हैं ,गर्त में डूबी तुम्हारी आँखें छल छल करते हुए मुझे देखकर जब बरसने को होती हैं उस दर्द से मेरा -व...
 पोस्ट लेवल : यथार्थ
नवीन "राज" N.K.C
301
किसी नेपीछे से धक्कादिया मैं थोड़ाआगे की तरफबढ़ गया फिर सेलगा किसी नेऐसा किया और मैंसम्हलते हुए -कुछ औरआगे आ गयामगर फिरऔर बेरुख़ीसे पेश आतेहुए ऐसा कियानिरंतर ऐसा होतागया और मैंइस बेहिसी परसंयम रखते हुएबढ़ते रहनेको मज़बूर होतागया ,मुझे ख़्यालआता है ऐसा काफीसमय से हो...
 पोस्ट लेवल : यथार्थ
केवल राम
314
गत अंक से आगे.....मनुष्य जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में अपने परिवेश से शब्दों के उच्चारण सीखता है. अधिकतर यह देखा गया है कि बच्चा सबसे पहले ‘माँ’ शब्द का ही उच्चारण करता है. फिर धीरे-धीरे वह अपनी जरुरत और सुविधा के हिसाब से शब्दों को सीखता है और उनका प्रयोग करता है....