ब्लॉगसेतु

अमितेश कुमार
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दीनानाथ मौर्य, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं. नाटक और रंगमंच के साथ शिक्षाशास्त्र इनकी विशेषज्ञता और रूचि का क्षेत्र है. 'यूनिवर्सिटी थियेटर' इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा बनाया गया समूह है जो अभी एक साल क...
अमितेश कुमार
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भारतीय रंगमंच को समझने के लिए किसी एक किताब का नाम लीजिए? इस सवाल के जवाब में अगर ‘रंग दर्शन’ का नाम लिया जाए तो शायद ही किसी को आपत्ति हो. ‘रंग दर्शन’ भारतीय रंगमंच की प्रवृतियों, विशेषताओं, सौंदर्य, सामाजिकता, ऐतिहासिकता, व्यवहारिकता आदि को एक साथ समझने...
अमितेश कुमार
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Courtesy- Newslaundry Hindiगिरीश कर्नाड, नहीं डॉ. गिरीश कर्नाड ... नाम जेहन में आते ही वो बेधने वाली तस्वीरें सामने आ जाती है जिसमें एक शख्स नाक में ड्रिप लगाए ‘नॉट इन माई नेम’ की तख्ती लिए हुआ खड़ा है, जो अपने समय में अपनी उपस्थिति को भौतिक रूप से भी दर्ज कर...
शिवम् मिश्रा
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सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। विश्व रंगमंच दिवस की स्थापना 1961 में इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट (International Theatre Institute) द्वारा की गई थी। रंगमंच से संबंधित अनेक संस्थाओं और समूहों द्वारा भी इस दिन को विशेष दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है। इस दिव...
kumarendra singh sengar
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बाबू मोशाय, हम-सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है. कब, कौन, कैसे उठेगा, यह कोई नहीं जानता. ये भले ही एक फिल्म का डायलॉग हो मगर वास्तविक जीवन में भी ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं. यहाँ उक्त दोनों पंक्तियों के बजाय चर्चा सिर्फ पहले हि...
अमितेश कुमार
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9'0हिंदी समाज उपर से भले ही एकरूपी  समाज  दिखता हो लेकिन इसके भीतर पदसोपानिकता के विविध स्तर हैं.  वर्ग और वर्ण के अतिरिक्त बहुत सारीसामाजिक प्रकियाएं हिंदी समाज के भीतर की हलचल को निर्धारित करती हैं. इसको संचालित करने वाले कई सूत्रों में से सबसे हाव...
 पोस्ट लेवल : हिंदी रंगमंच hindi theatre
अमितेश कुमार
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ड्रीम्स ऑफ तालीमधारा 377 को रद्द करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने शेक्सपियर का प्रसिद्ध संवाद ‘नाम में क्या रखा है?’ को उद्धृत किया। उद्धरण से ध्यान गया कि एलजिबिटीक्यूआई की सामाजिक स्वीकार्यता के लिए लड़ी गई लड़ाई को या इनके जीवन को सांस्कृतिक कला रूपों में व...
अमितेश कुमार
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हिंदी प्रदेश में आर्थिक दबावों के बीच रंगमंच कैसे सस्टेन करेगा. क्या सरकारी अनुदान से? वह पर्याप्त नहीं पड़ता ऐसा रंगकर्मी मानते हैं और अनुदान के आलोचक कहते हैं कि इससे रंगमंच की जनपक्षधर प्रवृति को कायम नहीं रखा जा सकेगा. कार्पोरेट अभी रंगमंच की तरफ अधिक संख्या मे...
अमितेश कुमार
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अनिल अजिताभ फिल्मकार और निराला पत्रकार हैं. बिहार से पहले आधुनिक अभिनेता को याद कर रहे हैं.निराला"अरे का बदल गया माधो पांडे के राज में? का बदल गया?""माधो पांडे का सतरंगा खेल जानोगे तो तरवा से पसेना निकलेगा, पसेना"."इ माधो पांडे एक नम्मर का जनावर चोर है.""बेरेन तो आ...
अमितेश कुमार
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श्रीवल्लभ व्यास नहीं रहे. जीवन का आखिरी समय कैंसर में जूझते हुए गुमनामी और आर्थिक कठिनाई में गुजार दिया जबकि उन्होंने ‘लगान’, ‘सरफरोश’, ‘सरदार’ इत्यादि कई फिल्मों में यादगार भूमिकाएं की थी. सिनेमा में जाने के पहले वह रंगमंच के बेमिसाल अभिनेता थे. दिल्ली में एनएसडी...