ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
157
सब कुछ वैसा ही है, जैसा कभी नहीं सोचा था। इस पंक्ति के बाद एकदम से सुन्न हो गया। आगे क्या कहूँ? कुछ कहने के लिए हैं भी या ऐसे ही दोहराव में हम अपने बिगड़ने को देखते रहते हैं। कई सारी बातें हैं, जिन्हे कहना है पर समेटने का सलीका थोड़ा भूलता गया हूँ। अभी खिड़की के बाहर...
Shachinder Arya
157
आज शायद इस कमरे में आखिरी रात होगी। इसतरह अभी सुबह इस कमरे में लिखी जा रही यह आख़िरी पोस्ट। छूटना सिर्फ़ बिन हड्डी वाले नरम दो हाथों का नहीं होता। कमरे भी छूटा करते हैं। यह स्थापत्य कला का कोई बेजोड़ नमूना नहीं है, हमारी न जाने कितनी ‘यादों का घर’ है। इसे एक दिन ऐसे ह...
Shachinder Arya
157
मैं एक कहानी लिखना चाहता हूँ। पता नहीं यह कितने साल पहले मेरे मन में आई बात है। यह कहानी सात आठ साल से मेरे अंदर ही अंदर खुद को बुन रही है। वह कभी बाहर नहीं आ सकी। उसे कभी लिख नहीं सका। मुझे लगने लगा कहानी लिखने का हुनर मुझमें नहीं है। मैं, जिसे कहानी कहते हैं, उसे...