ब्लॉगसेतु

Yashoda Agrawal
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कांच के जज्बात, हिम्मत कांच कीयार ये कैसी है इज्जत कांच की ?पालते हैं खोखले आदर्श हम-माँगते हैं लोग मन्नत कांच कीपत्थरों के शहर में महफूज़ है-देखिये अपनी भी किस्मत कांच कीचुभ गया आँखों में मंजर कांच का-दब गयी पाने की हसरत कांच कीसोचिये अगली सदी को देंगे क्यारंगीनिय...
 पोस्ट लेवल : रवीन्द्र प्रभात
Yashoda Agrawal
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उम्र के-एक पड़ाव के बादअल्हड़ हो जाती नदीऊँचाई-निचाई की परवाह के बग़ैरलाँघ जाती परम्परागत भूगोलहहराती- घहरातीधड़का जाती गाँव का दिलबेँध जाती शिलाखंडों के पोर -पोर अपने सुरमई सौंदर्य, भंवर का वेगऔर, विस्तार की स्वतंत्रता के कारण...!आक्रोशित हो जाती नदीएक पड़ाव क...
Roshan Jaswal
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पुस्तक समीक्षा रवीन्द्र प्रभात की परिकल्पना और ब्लॉग आलोचना कर्म नामक पुस्तक डॉ॰ सियाराम द्वारा लिखित है, जो कानपुर विश्वविद्यालय के अंतर्गत तिलक महाविद्यालय में एसिस्टेंट प्रोफेसर हैं। यह पुस्तक कानपुर विश्वव्द्यालय से लघुशोध पर आधारित है। लेखक के अनुसार इस पुस्तक...
अविनाश वाचस्पति
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() डॉ. रामबहादुर मिश्र विगत पाँच छः वर्षों में साहित्यकार रवीन्द्र प्रभात की छवि साहित्य जगत में एक ब्लॉगर, ब्लॉग विश्लेषक एवं लगभग आठ अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन के संयोजक के रूप में स्थापित हो गयी है जबकि उन्होने साहित्य की अनेकानेक विधाओं में प्रभावी लेखन...
Ravindra Prabhat
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बड़े ज़िद्दी, बड़े निडर, बड़े खुद्दार थे मुद्राहमारे बीच के फिक्रमंद फनकार थे मुद्रा।उन्हें इन मील के पत्थरों से क्या मतलब-जब सफ़र के लिए हर वक्त तैयार थे मुद्रा।दिन को रात औ रात को दिन कभी न कहा-तरक्कीपसंद इस क़ौम के तलबगार थे मुद्रा।उन्हें बस धर्म से, पाखंड से उबकाई...
रेखा श्रीवास्तव
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              माँ को हम सबसे अधिक ज्ञानी , अनुभवी और प्यार देने वाली समझते हैं और ऐसा होता भी है लेकिन कई बार ऐसी बातें होती हैं जिनके बारे में  हम जानते है और न उसकी जरूरत समझते हैं।  फिर अ...
 पोस्ट लेवल : रवीन्द्र प्रभात
संतोष त्रिवेदी
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'कलयुग के भगवान तुम्हारी जय हो ! तुम्हारे पास चमचमाती कार है, आलीशान बंगला है ढेर सारा रूपया है ... लजीज व्यंजन खाते हो ... विदेशी शराब और अर्द्धनगन सुन्दरियां तुम्हारी शाम को हसीन बनाती है।तुम्हारी काबिलियत तुम्हारे पुरुषार्थ की पृष्ठभूमि है ....कौन है इस जग...
Roshan Jaswal
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परिकल्पना सम्मान (तृतीय) हेतु चयन.... एक व्यक्ति ने चाहा कि अंतर्जाल पर हिन्दी के माध्यम से नए समाज की परिकल्पना को मूर्तरूप दिया जाये ....प्रयास किया ब्लॉग विश्लेषण से, फिर अचानक उसके जेहन मे आकार लेने लगी एक मौलिक परिकल्पना यानि -ब्लॉगोत्सव&nb...
Roshan Jaswal
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कई वर्षों से यह बहस आम है कि ब्लॉग पर जो साहित्य लिखे जा रहे हैं वह कूड़ा है यानि दोयम दर्जे का है । हमारे कई साहित्यिक मित्र ऐसे हैं जो बार-बार यह तर्क देकर मुझे चुप रहने का संकेत देते रहे हैं कि बताइये यदि ब्लॉग अभिव्यक्ति का बेहतर माध्यम होता तो हिन्दी के गंभीर...
Roshan Jaswal
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परिकल्पना की आगामी परियोजनाएं ....जैसा कि आप सभी को विदित है कि प्रत्येक वर्ष परिकल्पना द्वारा बहुआयामी वार्षिक ब्लॉग विश्लेषणमाह नवंबर-दिसंबर मे प्रकाशित किए जाते  है।  इस वर्ष ये विश्लेषण केवल अंतर्जाल पर हीं प्रस्तुत  नहीं किए जाएँगे अपितु वि...