ब्लॉगसेतु

Juban-ए- दास्तां
496
मेरे यहाँ एक नया नया मन्दिर खुला है,नाम हालांकि प्राचीन रखा है।लालची लोग आएं जल्दी - जल्दीमन्दिर को प्राचीन बनाये जल्दी - जल्दीइसलिए भंडारा सुबह-शाम चला रखा है।लालची लोग जाते हैं कुछ मांगनेऔर देकर आ जाते हैं यह भी नहींविचारते जिससे खुद मांगने जा रहे हैंउसे भला क्या...
Juban-ए- दास्तां
496
मैं लिखूं के ना लिखूं ,मुझपर दबाव है किमैं उनके हक में लिखूंमेरी कलम सदा विरोध।मैं लिखूं के ना लिखूं ,क्या चुप हो जाऊंमान लूं इसे खुदा फरमानजिये जाऊं चुपचाप।मैं लिखूं के ना लिखूं ,मुझे डर है कहीं देखमेरे शब्द समझ जाएंमेरे भीतर के डर को।मैं लिखूं के ना लिखूं ,पल पल...
Juban-ए- दास्तां
496
मैं चाहती थी एक कविता लिखनापर वो शब्द आते नहीं मेरे ज़हन मेंजो बयां कर सके उन संवेदनाओ को,जो महसूस होती हैं उन हर एक माता-पिताओं को,जिनके नोनिहालों ने ऑक्सीजन की कमी सेतोड़ दी थीं सांसे, छोड़ दिया था शरीर,और चले गए इस दुनिया से कहीं बहुत दूर।जिनकी उम्मीदें पंख लगने से...
Juban-ए- दास्तां
496
आप भी इस देश की संतान हैं ,किसने आपको पथभ्रष्ट किया है ,या स्वयं ही भूल गए हो ,आखिर तो आप भी इंसान हैं।किस चाह से हो लड़ रहे ,क्यों नफरतें फैला रहे ,लोगों में डर बैठा रहे ,क्या यही ईमान हैं।दबा देते हो चीखें , नहीं सिसकने भी देते ,बुझा देते हो नन्हे चराग़ को भ...
Juban-ए- दास्तां
496
यही की वह महाराष्ट्र के #आदिवासी परिवार से थी। नेशनल मेडिकल कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट (एम.डी.) की  पढाई कर रही थी..!!कॉलेज की कुछ सीनियर, तुच्छ मगजी सवर्ण महिलाओ ने...जाति के नाम पर डॉ पायल तड़वी को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। व्हाटसअप ग्रुप में उसकी जाति को लेक...
Juban-ए- दास्तां
496
गुलामी का दौर एकदम नहीं आया था भारत में...समय के साथ उसकी सीमा बढ़ती गयी जिससे देश को गुलामी जैसी जकड़न से गुजरना पड़ा। भारत में ईस्टइंडिया कंपनी का आगमन हुआ जो भारतवासियों का विश्वास जीतने में सफल रही थी। यही कारण था कि भारत जैसे प्रबुद्ध देश पर ईस्टइंडिया कंपनी और अ...
Juban-ए- दास्तां
496
आपको चाहना ।मेरी आदतों का पुलिंदा बन गया।जब सोचा छोड़ दूँगा तुम्हे।वही शाम मेरी शहादत का रहनुमा बन गया।अब बता ऐ खुदा!किसने बनाई ऐसी कुदरत?क्योंकि मेरी एक-एक साँस।उसका नपा-तुला तराजू बन गया।लेकिन एक तो जबरजस्त बात है उसमें।जब-जब सोचा।वो दिन ही शमाँ से बंध गया।न जाने...
Juban-ए- दास्तां
496
जब हुआ मतदान।खूब बाँटा गया।दारू और राशन-दान।देश की जनता।समझ वैठी।यही है।राजनीति का।अमूल्य-दान।लेकिन।भईया जब वैठे।गद्दी पर।वही राशन-दान।बन गया।बिलकुल विषपान।क्योंकि अब हुआ।अपना-अपना।राम-राम।लेकिन।इसका क्या हो।समाधान।इसलिए।भारतीय राजनीतिक पार्टियों को।अंकित चौरसिया क...
Juban-ए- दास्तां
496
हर चाँद में वों मंजर ही हो  हर प्रेमी उसे कुछ यूँ झाँके   हर वक्त रहे चाँदनी सफर  यह कब संम्भव , यह कब संम्भव ॥ हर रोज जेहन में आये तूं बस मीठा ही मुस्काये तूं   हर प्यार भरी नजरे तेरी  कुछ चुपके से कह जायें यूँ हर बात जो लुक...
Juban-ए- दास्तां
496
जो है यह हालतो आगे क्या होगा,बनी स्पात की दुनियांयहां मनुष्य का क्या होगा।खो दिया सब आज यहांना जाने आगे क्या होगा,देखि यह दहल जातु है दिलयहां मनुष्यता का क्या होगा।संवेदनहीन बने हैं सबइस अचला का क्या होगा,पवन सी पवन ना रही अबआखिरी सांस का क्या होगा।सुधर लो समय कम ब...