ब्लॉगसेतु

मधुलिका पटेल
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बेटी पराया धन नहीं माँ - बाप का नायाब हीरा होती है बेटी की विदाई यह एक शब्द है पर क्या हम वाकई बेटी को विदा कर पाते हैं दो बक्सों में सामान रखने से बेटी की विदाई संपूर्ण नहीं होती उसने इतने सालों सेजो उस घर को बिखेर...
kumarendra singh sengar
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तुम हम सबको हमेशा के लिए उसी शाम छोड़कर चले गए गए थे. उस शाम से लेकर तुम्हारी पार्थिव देह के पंचतत्त्व में विलीन हो जाने तक एक आस सी जगती कि यह खबर गलत हो जाये और तुम हमेशा की तरह अपनी शैतानियों के साथ, अपने खिलंदड़ स्वभाव के साथ हम सबके बीच आ जाओ. उस झूठी आस के साथ...
kumarendra singh sengar
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समय का गुजरना सिर्फ गुजरना ही नहीं होता है बल्कि उसके साथ बहुत कुछ भी गुजर जाता है. गुजरता हुआ समय अपने गुजरने का एहसास कराता हुआ बहुत खालीपन छोड़ जाता है. इस खालीपन के साथ बहुत सारी बातें याद रह जाती हैं और बहुत सी बातें हमेशा को जुड़ी रह जाती हैं. इस समय ने ही संबं...
kumarendra singh sengar
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अक्सर ऐसा होता है कि कोई-कोई दिन बहुत ख़राब निकलता है. कई बार खुद का मन ही ऐसा होता है कि किसी काम में मन नहीं लगता है और कई बार ऐसा होता जाता है कि मन अपने आप ही ख़राब होता जाता है. इसी के साथ-साथ कई बार ऐसा भी होता है कि एक के बाद एक इस तरह से खबरें सामने आती जाती...
kumarendra singh sengar
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सामाजिकता का ताना-बाना वर्तमान में किस कदर उलझ गया है, इस बात की कल्पना कर पाना भी कई बार सम्भव सा नहीं लगता है. जीवन की आपाधापी में, मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की जद्दोजहद में इंसान रिश्तों की कदर करना भूलता सा जा रहा है. रिश्तों का आपसी साहचर्य भी उसके लिए वि...
जेन्नी  शबनम
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मुट्ठी से फिसल गया ******* निःसंदेह, बीता कल नहीं लौटेगा   जो बिछड़ गया, अब नहीं मिलेगा   फिर भी रोज़-रोज़ बढ़ती है आस   कि शायद मिल जाए वापस   जो जाने अनजाने, बंद मुट्ठी से फिसल गया।   खुशियों की ख़्वाहिश. गो...
 पोस्ट लेवल : व्यथा समाज रिश्ते
kumarendra singh sengar
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आए दिन रिश्तों की बदलती परिभाषा देखने को मिलती है। अचानक से सम्बन्धों की प्रगाढ़ता में नकारात्मक परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं। रिश्तों, सम्बन्धों की ऐसी प्रगाढ़ता के अचानक से समाप्त होने के पीछे की स्थिति का आकलन लोग करने के बजाय सम्बन्धों, रिश्तों को तोड़ने में ज्या...
kumarendra singh sengar
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समय जिस तेजी से निकल रहा है उसे देखकर भविष्य की योजनायें बनाने से बेहतर है कि वर्तमान को इस तरह से सुसज्जित किया जाये कि भविष्य स्वतः ही बेहतर बन जाए. इस वर्ष के पहले तक लोगों में आपाधापी देखने को मिलती थी, भौतिक वस्तुओं के प्रति एक तरह की तृष्णा दिखाई पड़ती थी, संस...
kumarendra singh sengar
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जिम्मेवारियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं बल्कि अपना रूप बदल-बदल कर सामने आती ही रहती हैं. कई बार ऐसा सुनते थे लोगों को कहते कि फलां जिम्मेवारी से निपट जाएँ तो आराम मिले मगर हमें लगता है कि यदि व्यक्ति में वाकई जिम्मेवारी का भाव है तो वह कभी भी जिम्मेवारी से मुक्त नहीं ह...
kumarendra singh sengar
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भारतीय राजनीति में राजमाता के रूप में सम्मानजनक रिश्ता बनाने वालीं विजयाराजे सिंधिया जी की आत्मकथा आज हमें आशीर्वाद देने को प्राप्त हुई. उनके यथार्थ का प्रतिबिम्ब बनती राजपथ से लोकपथ पर को देखकर बहुत सी यादें ताजा हो गईं. जनमानस के लिए राजमाता हमारे लिए बुआ जी रहीं...