ब्लॉगसेतु

Bharat Tiwari
23
रुचि भल्ला की परिकथा में प्रकाशित कहानी,आई डोन्ट हैव ए नेम समय सुबह साढ़े पाँच बजे का है । इस वक्त आसमान का रंग वंशीधर के रंग सा हो आया है। तारों की टिमटिमाती लौ धीमी पड़ती जा रही है ...मुर्गे की बाँग और कड़क। गिन कर दस बार बाँग दे चुका है चाॅर्ली का कलगीदार म...
Bharat Tiwari
23
प्रेम का ज़ख़्म तो वैसे भी सदा गहराता है...हरा रहता है ताउम्र...जैसे रहता है नीम के दरख्त पर झूमते पत्तों का रंग दूर देस की पाती - 1— रुचि भल्लाचैत मास की यह सुबह...आकाश आज निखरा-निखरा सा दिख रहा है...कल शाम की बूँदा-बाँदी ने सूरज के चेहरे को झिलमिलाते आइने सा चमका...
Bharat Tiwari
23
रुचि भल्लारचना का जीवंत होना ज़रूरी है. रचनाकार उसे जन्म देता है और उसे ही यह देखना होता है कि उसकी कृति, कवि की कविता, लोगों से दूर नहीं भागे, लोगों को दूर न भगाए. रुचि भल्ला ने अपनी कविताओं का लालनपालन बहुत ध्यान से किया है, उनकी कवितायेँ मन मोह गयीं. आप भी देखिये...
Ashok Kumar
159
 रुचि भल्ला की कविताएं इधर लगातार सामने आई हैं। उनकी कविताओं की ख़ासियत एक मुख़तसर सी विविधता है। वह भीतर से अधिक बाहर भटकती हैं अपनी कविताओं में और अक्सर बाहर के किसी दृश्य से भीतर के तन्तु जोड़ने की कोशिश करती लगती हैं। भूगोल उनका क्षेत्र हैं तो संवेदना उनकी ता...
Shreesh Pathak
354
रुचि भल्लारोमियो और एंटी-रोमियो के इस दौर में प्रेम, प्यार, इश्क़ ये सब कहने मे कितने सहज लगते हैं ! कुल ढाई आखर ही तो है, पर ये ढाई आखर ही कभी  ढाई सौ गुलाब की गुलकंद लगते हैं तो कभी ढाई मन रेत का बोझ बन जाते  हैं |एक बारगी प्रेम करना सहज है जब कि प्रेम म...