रात्रि का दूसरा पहरकुछ पेड़ ऊँघ रहे थेकुछ मेरी तरह शहर का शोर सुन रहे थेकि पदचापों की आती लय ताल नेकानों में मेरेपंछियों का क्रंदन उड़ेल दियातभी देखा अँधेरों मेंचमकते दाँतों के बीचराक्षसी हँसी से लबरेज़ दानवों कोजो कर रहे थे प्रहार हम परकाट रहे थे हमारे हाथों कोप...