ब्लॉगसेतु

Kheteswar Boravat
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अजय  कुमार झा
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यूं तो कचहरी  में रोज़ ही एक नहीं बल्कि अनेक , किस्से कहानियां और दास्तानें ऐसी देखने सुनने को मिल जाती हैं कि उन्हें दर्ज करने लगूं तो पोस्ट निरंतर ही लिखने की जरूरत पड़ेगी और सोचता हूँ कि ऐसा हो भी जाए तो पिछले दिनों लगभग छूट चुकी ब्लौंगिंग  में भी एक निय...
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बस यही दौड़ है इस दौर के इन्सानो कीतेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बनेतू रहे पीछे और मैं सदा आगेऐसी कोई बात या करामात बनेनिंदा हो या हो आलोचनाकरता तू है यही आराधनाकी मैं न आगे निकलु तेरे सेइसके लिए ही करुगा साधनागया जमाना मदद , सहयोग कालगता है ये कुछ हठयोग साअगर न माना...
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त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च  त्रिसमस्त्रिपु चोन्नतः त्रिताम्रस्त्रिपु च स्निग्धो गंभीरस्त्रिषु नित्यशः त्रिवली मांस्त्रयंवतः ......................सुन्दरकाण्ड ३५/१७-१८ आप सभी को भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव रामनवमी की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाये. आपके अ...
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आज के इस भागमभाग भरी जिन्दगी में किसी के पास भी समय नहीं है लेकिन पुछो की क्या करते है तो उनका जवाब यही होता है की – कुछ खास नहीं या कुछ भी तो नहीं । हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है एक साथ मिलना बड़ा मुश्किल हो गया है लेकिन तकनीक के इस समय मे हम हमेसा एक दूसरे से...
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चेहरे की वो बातअधूरी रह गई थी रातकिनारे बैठे थे वे साथडाले एक दूसरे मे हाथकह रहे थेसुन रहे थेएक दूसरे कोबुन रहे थेऔर चेहरा पढ़ने की कोशिश मेएक दूसरे पर हस रहे थेफिर झटके से टूटा सपनासब कह रहे है अपना अपनापर अनुभव भरे इस ज़िंदगी मेदर्द कर रहा है मेरा टखनारात रह गईबात...
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क्या रोज डेक्या प्रपोज डे क्या करे प्रॉमिस डे कोकिसे किस करे किस डे को जब गर्ल फ्रेंड ही नहीं हमारी तो आग लगे इस वेलेंटाइन डे को जिस के नीचे बया करते है प्यार अपनाथोड़ा प्यार करे उस पेड़ को अक्सर धोखा खा जाते है इश्क मे लोग क्योकि दिल की जगह जिस्म चाहने लगे है लोग प्...
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पलटना एक शब्द नहींइसका एक ही अर्थ नहीं समझ – समझ का अन्तर और जो न समझे वो बंदर कुछ लोग पलटा जाते हैधीरे से सरक जाते है नहीं रहती अपनी ही बात याद उनको और हमे भूल जाने की बात करते है किन्तु पलटने से पहले सटना जरूरी है और आगे बाद मे लिखूगा क्योकियह रचना अभी अधूरी है ....
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बचपन की वो दुनिया पचपन की उम्र में भी नहीं भूलती क्योंकि जो की थी शरारते वो भी कुछ नहीं कहती ।।  न तो लोग बुरा मानतेऔर न ही मुझे मनाते रूठे और मनाने के खेल सेहम किसी को नहीं सताते ।। शाम को जब हम छत पर जाते खेलते कूदते नहीं घबराते पर आज के इस परिवेश में हम बचप...
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मकर संक्रांति अनेकता में एकता का पर्वमकर सक्रांति के दिन भगवान् भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं चूंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं अतः इस दिन को मकर सक्रांति के नाम से जाना जाता है | महाभारत काल में भीशमपितामा ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर...