ब्लॉगसेतु

usha kiran
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शादी की कई रस्मों में से एक मनभावन रस्म है पग फेरों की।नवब्याहता बेटी शादी के बाद जब पहली बार सजी- धजी दामाद संग मायके आती है तो कुछ अलग ही उल्लास व उछाह मन में व घर भर में छा जाता है।लॉन में दिसम्बर की  सुनहरी सी धूप में बेटी मनिका और दामाद शेखर बीनबैग में अध...
 पोस्ट लेवल : लघुकथा
sanjiv verma salil
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सॉनेटधीर धरकर•पीर सहिए, धीर धरिए।आह को भी वाह कहिए।बात मन में छिपा रहिए।।हवा के सँग मौन बहिए।।मधुर सुधियों सँग महकिए।स्नेहियों को चुप सुमिरिए।कहाँ क्या शुभ लेख तहिए।।दर्द हो बेदर्द सहिए।।श्वास इंजिन, आस पहिए।देह वाहन ठीक रखिए।बनें दिनकर, नहीं रुकिए।।असत् के आगे न झ...
sanjiv verma salil
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मुण्डकोपनिषद १परा सत्य अव्यक्त जो, अपरा वह जो व्यक्त।ग्राह्य परा-अपरा, नहीं कहें किसी को त्यक्त।।परा पुरुष अपरा प्रकृति, दोनों भिन्न-अभिन्न।जो जाने वह लीन हो, अनजाना है खिन्न।। जो विदेह है देह में, उसे सकें हम जान।भव सागर अज्ञान है, अक्षर जो वह ज्ञान।। मन इंद्रिय अ...
sanjiv verma salil
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नवगीत *बदल गए रे दिन घूरे के कैक्टस दरवाज़े पर शोभित तुलसी चौरा घर से बाहर पिज्जा गटक रहे कान्हा जू माखन से दूरी जग जाहिर गौरैया कौए न बैठते दुर्दिन पनघट-कंगूरे के मत पाने चाहे जो बोलो मत पाकर निज पत्ते खोलो सरकारी संपत्ति बेच दो जनगण-मन में नफरत घोलो लड़ा-भिड़ा खेती...
sanjiv verma salil
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सॉनेटसुतवधु *सुतवधु आई, पर्व मन रहा।गूँज रही है शहनाई भी।ऋतु बसंत मनहर आई सी।। खुशियों का वातास तन रहा।। ऊषा प्रमुदित कर अगवानी।रश्मिरथी करता है स्वागत। नज़र उतारे विनत अनागत।।  शुभद सुखद हों मातु भवानी।।जाग्रत धूम्रित श्वास वेदिका।&nbs...
ऋता शेखर 'मधु'
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 लघुकथा- लंच बॉक्सदसवीं कक्षा की क्लास लेते हुए अचानक सुधा मैम ने पूछा," बच्चों, यह बताओ कि आज सुबह का नाश्ता किये बगैर कौन कौन आया है।"एक छात्रा ने हाथ उठाया।" क्या घर में कुछ बन नहीं पाया था""बना था, पर उसे छोटी बहन के लंच बॉक्स में मम्मी ने देकर भेजा।"...
 पोस्ट लेवल : लघुकथा
sanjiv verma salil
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लघुकथा सबक *'तुम कैसे वेलेंटाइन हो जो टॉफी ही नहीं लाये?'''अरे उस दिन लाया तो था, अपने हाथों से खिलाई भी थी. भूल गयीं?'''भूली तो नहीं पर मुझे बचपन में पढ़ा सबक आज भी याद है. तुमने कुछ पढ़ा-लिखा होता तो तुम्हें भी याद होता.'''अच्छा, तो मैं अनपढ़ हूँ क्या?'''मुझे क्या प...
 पोस्ट लेवल : लघुकथा सबक
sahitya shilpi
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भूख [लघुकथा] – मनोज शर्मा दिन कितना हरा भरा था पर शाम होते होते सबकुछ धुंधला अस्पष्ट सा नज़र आने लगा। घर के बाहर बल्ब की मद्धिम रोशनी कुछ दूर जल रहे होलिजन लाइट में कहीं गुम हो रही थी। गली के एक कोने में दो तीन कुत्तों के भौंकने की आवाज़ हुई जिसको सुनकर और कुत्ते भ...
sahitya shilpi
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दो साल पहले की ही बात है, शर्मा जी के पड़ोस में चोरी हो गई थी। चोरी कोई बड़ी नहीं थी, गुप्ता जी की पुरानी कार चोर ले गया था। शर्मा जी ने फिर भी पड़ोसियों को समझाया कि मोहल्ले के दोनों ओर लोहे के गेट लगवा लेते हैं। चोरी की संभावना समाप्त हो जाएगी। एक गार्ड को ड्यूटी...
 पोस्ट लेवल : नीरज त्यागी लघुकथा
sanjiv verma salil
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लघुकथा:ठण्ड *संजीव बाप रे! ठण्ड तो हाड़ गलाए दे रही है। सूर्य देवता दिए की तरह दिख रहे हैं। कोहरा, बूँदाबाँदी, और बरछी की तरह चुभती ठंडी हवा, उस पर कोढ़ में खाज यह कि कार्यालय जाना भी जरूरी और काम निबटाकर लौटते-लौटते अब साँझ ढल कर रात हो चली है। सोचते हुए उ...
 पोस्ट लेवल : लघुकथा ठण्ड