"शरद पूर्णिमा का चाँद"चाँदी जैसी आब लिएधवल ज्योत्सना कीऊँगली थाम...बादलों पर कर सवारीनीलाम्बर आंगन मेंउतरा है अपनी पूरी ठसक भरीसज-धज के साथशरद पूर्णिमा का चाँदरात की सियाही मेंकहीं भी..धरती पर उगेअनगिनत दिपदिपातेअपने सरीखे दिखतेभाई-बंधुओं के बीचठगा सा सोचता है...
 पोस्ट लेवल : लघु कविताएँ