ब्लॉगसेतु

सतीश सक्सेना
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हे प्रभु ! इस देश में इतने निरक्षर, ढोर क्यों ?जाहिलों को मुग्ध करने को निरंतर शोर क्यों !अनपढ़ गंवारू जान वे मजमा लगाने आ गए ये धूर्त मेरे देश में , इतने बड़े शहज़ोर क्यों ?साधु संतों के मुखौटे पहन कर , व्यापार में   रख स्वदेशी नाम,सन्यासी मु...
सतीश सक्सेना
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ये रिश्ते जटिल हैं, समझना तो होगा !तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा !उठो त्याग आलस , झुकाओ न नजरें भले मन ही मन,पर सुधरना तो होगा ! अगर जीना है आओ हंसकर खुले में शुरुआत में कुछ ,टहलना तो होगा !यही है समय ,छोड़ आसन सुखों का स्वयं स्वस्त्ययन&nb...
सतीश सक्सेना
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अनुत्तरित हैं प्रश्न तुम्हारे कैसे तुमसे नजर मिलाऊंअसहज कष्ट उठाए तुमनेकैसे हंसकर उन्हें भुलाऊंयुगों युगों की पीड़ा लेेेकर पूंछ रही है नजर तुम्हारीमैं तो अबला रही शुरू सेतुम सबने, चूड़ी पहनाईं !हर दरवाजा जीतने वाला , इस दरवाजे हारा क्यों है।बचपन तेरी...
सतीश सक्सेना
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अगर परिवार में कुछ समय से बिना कारण एक घातक लड़ाई का वातावरण तैयार हो चुका हो तो आपस में न लड़कर शांत मन से तलाश करें कि घर में कोई भेड़िया तो नहीं आ गया जिसे आपने कुत्ता समझकर घर की चौकीदारी ही सौंप दी हो !वही कहलायेंगे शेरे जिगर रह कर गुफाओं मेंअकेले जंगलों में भी ज...
सतीश सक्सेना
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जहाँ पूजा का हो अपमानवहां बन जाते कालिदासजहाँ प्रीति का हो उपहासवहीं पैदा हों तुलसी दासइतने गहरे तीर , मृदुल आवेग ख़त्म कर जाते हैं !चुभते तीखे शब्दों से, अनुराग ख़त्म हो जाते हैं !जहाँ परिवार मनाये शोक जन्मते ही कन्या को देख&n...
सतीश सक्सेना
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अक्सर हम लोग सोंचते हैं कि हम जो कुछ बेईमानी अथवा गलती कर रहे हैं वह दूसरों को नहीं मालूम पड़ेगी, जीवन की भयंकर भूल साबित होती है आपके आसपास उपस्थित लोगों  एवं बच्चों तक को, आपकी वह चालाकी मालुम पड़ जाती है और आप उनकी नज़रों से कब के गिर चुके...
सतीश सक्सेना
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मुझे कष्ट दे,वे खुद भी थक जातीं होंगीं करवट लेले खुद को खूब जगातीं होंगीं !दिन तो कटता जैसे तैसे , मगर रात भर,स्वयं लगाए ज़ख्मों को सहलातीं होंगीं !शब्द सहानुभूति के विदा हुए , कब के !अब सखियों में बेचारी,कहलातीं होंगीं !जीवन भर का संग लिखा ...
सतीश सक्सेना
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पापा के कन्धों पै चढ़केचन्दा तारे सम्मुख देखे !उतना ऊंचे बैठे  हमने,सारे रंग , सुनहरे  देखे !उस दिन हमने सबसे पहले, अन्यायी को मरते देखा !शक्तिपुरुष के कंधे चढ़ कर हमने रावण गिरते देखा !उनके बाल पकड़कर मुझको सारी बस्ती बौनी लगती !गली...
सतीश सक्सेना
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कितनी बार सबेरे माँ ने , दरवाजा खटकाया होगा !और झुकी नज़रों से, तेरे आगे, हाथ फैलाया होगा !वे भी दिन थे जब अम्मा की,नज़र से सहमा करते थेसबके बीच डांट के कैसे उनको चुप करवाया होगा !यही बहिन थी,जो भाई के लिए,सभी से लडती थी !तुमने उसको,फूट फूट...
सतीश सक्सेना
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मुखौटे  लगाकर , बदल  ही तो जाते, बिना देखे हमको निकल ही तो जाते !विदाई से पहले , खबर तक नहीं की  तुम्हें देखकर, बस मचल ही तो जाते !   बुलावा जो आता तो आहुति भी देते  हवन में भले हाथ, जल ही तो जाते !अग...