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PRABHAT KUMAR
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मेरा लिखना, लिखना क्या अगर वह विवादित नहींसूरज को सूरज और चांद को चांद तो सब कहते हैंअगर मैं सूरज को चांद न कहूँ तो इनको परिभाषित कौन करेअगर मैं तुम्हारी तरह हाँ में हाँ मिलाकर उनसे कुछ न बोलूंजिनके भक्त बन जाते हैं और अनुयायी पैमाने पर चलते हैंतो मैं भी भक्त ही कह...
PRABHAT KUMAR
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इस अंधकार को उजाला देकरकविता लिखना हैजीवन भर रोने वाले कोहंसकर जीना हैहै मात्र नही चुनौती जोस्वीकार करूँ और बढ़ जाऊंपता नही शायद कितनेभावों का प्याला पीना हैहै रुदन वही जहाँ प्रेम दिखेहै काँटे वही जहां फूल दिखेहै प्रेम वही जहां त्याग दिखेहै सत्य वही जहां विश्वास दिख...
 पोस्ट लेवल : कविता लिखना है कविता
Shachinder Arya
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तो साहिबान हम चलते हैं। फ़िर कब मिलेंगे, पता नहीं। मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी  वाला निदा फ़ाजली का शेर याद आ रहा है। उसे लिख भी दूँ, तब भी नहीं मिलेंगे। क्या करूँ? मन भी तो खाली होना चाहता है। इस जगह ने सारी खाली जगहें अपने नाम से रख ली हैं। कोई और बात...
Shachinder Arya
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कल पूरी रात करवट-करवट नींद में सवाल थे और नींद गायब थी। मन में दोहराता रहा, अब बस। अब और नहीं लिखा जाता। कोई कितना कह सकता है। सच, इन पाँच सालों में जितना भी कहा है, मेरी दुनिया को समझने की मुकम्मल नज़र दिख जाती है। मेरे पास बस इतना ही है, मुझे अब यह समझ लेना चाहिए।...
Shachinder Arya
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वह एक खाली-सी ढलती दोपहर थी। दिमाग बेचैन होने से बिलकुल बचा हुआ।किताबें लगीं जैसे बिखरी हुई हों जैसे. कोई उन्हें छूने वाला नहीं था. कभी ऐसा भी होता, हम अकेले रह जाते हैं।किताबों के साथ कैसा अकेलापन. उनकी सीलन भरी गंध मेरी नाकों के दोनों छेदों से गुज़रती हुई पता नहीं...
Shachinder Arya
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दुनिया कितनी बड़ी है। इसके बीतते एक एक पल में इतनी सारी चीज़ें एक साथ घटित हो रही हैं, जिन्हें कह पाने की क्षमता मुझ अकेले में नहीं है। लिख तो तब पाऊँ जब उनतक मेरी पहुँच हो। दरअसल यह बात मुझे मेरी औकात बताने के वास्ते है। मैं कोई इतना दिलचस्प या गंभीर लेखक या अध्येता...
Shachinder Arya
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मुझे नहीं पता लोग कैसे लिखते हैं। पर जितना ख़ुद को जानता हूँ, यह लिखना किसी के लिए भी कभी आसान काम नहीं रहा। हम क्यों लिख रहे हैं(?) से शुरू हुए सवाल, कहीं भी थमते नहीं हैं। उनका सिलसिला लगातार चलता रहता है। पर एक बात है, जो इस सवाल का एक ज़वाब हो सकती है। वह यह कि ह...
Shachinder Arya
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मैं लिखना चाहता हूँ वह शब्द, जो आज से पहले कभी किसी ने नहीं लिखे हों। वह एहसास जो किसी ने न महसूस किए हों। कहीं से भी ढूँढ़ना पड़े, उन्हे खोजकर ले आऊँगा। उन्हें ढूँढ़ने में कितना भी वक़्त बीत जाए, पर वह मिल जाएँ, एकबार। कभी मन करता है, बस ऐसे ही उनकी तरह गुम होते रहना...
Shachinder Arya
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एक बात साफ़ तौर पर मुझे अपने अंदर दिखने लगी है। शायद कई बार उसे कह भी चुका हूँ। शब्द भले वही नहीं रहते हों पर हम अपनी ज़िंदगी के भीतर से ही कहने की शैली ईज़ाद करते हैं। वह जितना हमारे भीतर से आएगी, उनती सघनता से वह दूसरों को महसूस भी होगी। इसे हम एक तरह की कसौटी भी मा...
Shachinder Arya
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कभी-कभी ख़ुद को दोहराते रहा चाहिए। अच्छा रहता है। गहराई नापते रहो। इसका अंदाज़ा बहुत ज़रूरी है। पता रहता है, हम कहाँ से चले थे और आज कहाँ है। बड़े दिनों से सोच रहा था, कहाँ से शुरू करूँ। मन में एक ख़ाका घूमते-घूमते थक गया। बस हरबार यही सोचता रहा, कैसे दिन हुआ करते थे।...