ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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पता नहीं यह दिन कैसे हैं? कुछ भी समझ नहीं आता। मौसम की तरह यह भी अनिश्चित हो गये हैं जैसे। जैसे अभी किसी काम को करने बैठता हूँ के मन उचट जाता है। खिड़की पर पर्दे चढ़ाकर जो अंधेरा इन कम तपती दुपहरों में कमरे में भर जाता है, लगता है, वहीं किसी कोने से दाख़िल होकर मेरे म...
Shachinder Arya
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मैं कभी कुछ नहीं बोलूँगा, बस चुप रहूँगा। आप जब कुछ कहेंगे, तब मैं कुछ नहीं कहूँगा। आप देखने को कहेंगे, मैं बिलकुल नहीं देखुंगा। आपकी सहजता को असहजता में नहीं बदलने दूँगा। आप सहज रहें इसलिए खुद ही असहज होता रहूँगा। कुछ बोलने से पहले कुछ नहीं बोलूँगा। आपके लिए अपना...
Shachinder Arya
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कभी-कभी सोचता हूँ, जिस तरह ख़ुद को बेतरतीब लगने की कोशिश हम सब कभी-न-कभी अपने अंदर करते रहते हैं, उनका सीधा साधा कोई मतलब नहीं निकलता। यह बिलकुल वैसी ही बात है जैसे लिखने का ख़ूब मन हो और तभी प्यास लग जाये। पानी की बोतल कमरे में दूर रखी है। इसलिए उठना पड़ेगा। पर यकायक...
Shachinder Arya
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देखते-देखते पाँच साल बीत गए। जैसे अभी कल ही की तो बात है। लेकिन जैसे अगले ही पल लगता है, यह पिछली पंक्ति और उससे पिछली पंक्ति कितनी झूठ है। सरासर झूठ। पाँच साल। कितना बड़ा वक़्त होता है। हमारी ज़िंदगी के वह साल, जब हम जोश से भरे हुए किसी भी सपने को देख लेने की ज़िद से...
Shachinder Arya
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कल रात इस ख़याल के दिल में उतरते जाने की देर थी कि नींद फ़िर लौट के नहीं आई। उस दृश्य को अपने सामने घटित होते देखता हूँ तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं। रात ऐसे ही कई बार गिरफ़्त में ले लेती है। फ़िर छोड़े नहीं छोड़ती। गुप्ता जी वहीं कहीं सड़क किनारे ख़ून से लथपथ पड़े रह गए हों...
Shachinder Arya
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बिलकुल अभी, सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सोच रहा था, कितना अच्छा होता, मैं इस दुनिया के किसी भी देश का नागरिक न होता। पर इस सोचने के साथ ही एक पल में मैंने न केवल राष्ट्र-राज्य के राजनैतिक इतिहास को ख़ारिज कर दिया अपितु इसकी किसी भी तरह से हताश दिखने वाली टिप्पणी में उन सारी पर...
Shachinder Arya
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यह मेरे ऊपर किसी बोझ की तरह है। रूई के बोझ की तरह। मेरी रूई बार-बार भीग जाती है। बार-बार वापस आकर अपने लिखने को देखने की प्रक्रिया में लगातार उसे घूरते रहना कितना पीड़ादायक अनुभव रहा होगा। यह अपने आप में कोई मौलिक सवाल नहीं है। कई सारे लोग कभी इस पर बात करने की फ...
Shachinder Arya
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बड़े दिनों बाद आज अपने बारे में सोचता रहा। सोचता तो हमेशा रहता हूँ। पर आज लिखने के लिए थोड़ा अलग तरह से अंदर की तरफ़ लौटने लगा। जून की तपती दुपहरे कहीं जाने नहीं देतीं। फ़िर भी दोबार निकल गया। हम लोग घंटों वहीं आर्ट्स फैकल्टी की अँग्रेजी मेहराबों के बीच में पुराने दिनो...
Shachinder Arya
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मेल से आई चिट्ठी जादा सबर और वक़्त मांगती है, लोग कहीं अरझे नहीं रहना चाहते होंगे। शायद इसलिए हमारी दुनिया इससे इससे बचती रही होगी। पर मुझे आश्चर्य है कि आप कैसे वहाँ तक पहुँच गईं कि मैं इतना लिखते हुए भी चुप्पा किस्म का हूँ? बहुत मानीखेज लगा मुझे। पता नहीं यह क्या...
Shachinder Arya
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आज शायद इस कमरे में आखिरी रात होगी। इसतरह अभी सुबह इस कमरे में लिखी जा रही यह आख़िरी पोस्ट। छूटना सिर्फ़ बिन हड्डी वाले नरम दो हाथों का नहीं होता। कमरे भी छूटा करते हैं। यह स्थापत्य कला का कोई बेजोड़ नमूना नहीं है, हमारी न जाने कितनी ‘यादों का घर’ है। इसे एक दिन ऐसे ह...