ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
0
साल ख़त्म होते-होते फ़िर लगने लगा इस नाम के साथ बस यहीं तक। यह मेरे हारे हुए दिनों का नाम है। जैसे बिन बताए एक दिन अचानक इसे शुरू किया था, आज अचानक बंद कर रहा हूँ। इस भाववाचक संज्ञा से निकली ध्वनियाँ मेरे व्यक्तित्व पर इस कदर छा गयी हैं, जिनसे अब निकलना चाहता हूँ। कै...
Shachinder Arya
0
नवंबर आ गया है और कल से ठंड भी कुछ बढ़ गयी है। कश्मीर में बर्फ़ गिरी है। बर्फ़ इंडिया गेट पर उतनी ही अजीब होगी जैसे कि कल एककाँग्रेसी नेता के अपनी लड़कियों को बोझ बताने वाले हलफ़नामे पर रोष प्रकट करते राम माधव थे। इधर कई दिनों से गायब था। बीच में कईबार लौटने की कोशिश भी...
मुकेश कुमार
0
जब भी मैं उन्मुक्त हो कर खुशी से झूमकर बिन सोचे समझे खिल खिला उठता तो वो कहती बड़े बुरे दिखते हो आप क्योंकि आगे वाले दो दाँतो के बीच का खुला पटदिख ही जाता है, दूर से !!जब भी दिल से अन्तर्मन से बहुत सोच समझ कर उकेरता...