ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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मन भाग रहा है। पता नहीं क्या है, जिसके न होने से लिख नहीं पा रहा। अजीब-सी स्थिति है। कभी मन करता है, एक एक अधूरी पोस्ट खोलकर उसे पूरा करता जाऊँ। पर नहीं कर पाया। वहाँ से वर्ड में लिखने बैठा हूँ तो अब बाहर निकल कर घूम आने को जी चाह रहा है। शुक्रवार शाम पौने सात बजे...
Shachinder Arya
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दुनिया कितनी बड़ी है। इसके बीतते एक एक पल में इतनी सारी चीज़ें एक साथ घटित हो रही हैं, जिन्हें कह पाने की क्षमता मुझ अकेले में नहीं है। लिख तो तब पाऊँ जब उनतक मेरी पहुँच हो। दरअसल यह बात मुझे मेरी औकात बताने के वास्ते है। मैं कोई इतना दिलचस्प या गंभीर लेखक या अध्येता...
Shachinder Arya
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बिलकुल अभी, सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सोच रहा था, कितना अच्छा होता, मैं इस दुनिया के किसी भी देश का नागरिक न होता। पर इस सोचने के साथ ही एक पल में मैंने न केवल राष्ट्र-राज्य के राजनैतिक इतिहास को ख़ारिज कर दिया अपितु इसकी किसी भी तरह से हताश दिखने वाली टिप्पणी में उन सारी पर...
Shachinder Arya
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न लिखना पाना किसी याद में रुक जाना है। इसे टाल देना, उसमें ही कहीं छिप जाना है। लगता है, इधर ऐसे ही छिप गया हूँ। यहाँ न आने के पीछे कई गैर-ज़रूरी बातें रही होंगी। पर उनका होना कतई इसलिए गैर-ज़रूरी नहीं रहा होगा। उनकी कलई खुलते-खुलते देर लगती है, पर पता लग जाता है। इस...
Shachinder Arya
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अँधेरा जल्दी होने लगा है। ठंड इतनी नहीं है। धीरे-धीरे बहुत सी तरहों से सोचने लगा हूँ। कई बातें लगातार चलती रहती हैं। पीछे लगतार अपने लिखने पर सोचता रहा। एक बार, दो बार, तीन बार । पर कहीं भी पहुँच न सका। ख़ुद की बुनावट में कई चीज़ें इस तरह गुंफित हैं कि वह इतना आसान ल...
Shachinder Arya
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उस इमारत का रंग लाल है। अंग्रेजों के जमाने की। अभी भी है। ख़स्ताहाल नहीं हुई है। उसकी देखरेख करने वाले हैं। किसी लॉर्ड ने इसका शिलान्यास किया होगा। आज़ादी से पहले। कई बार उसे पत्थर को पढ़ा है, पर अभी याद नहीं है। यहाँ ख़ूब बड़े-बड़े कमरे हैं। जीने भी शानदार सीढ़ियों के सा...
Shachinder Arya
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सबसे मूलभूत सवाल है, हम लिखते क्यों हैं? यह लिखना इतना ज़रूरी क्यों बन जाता है? मोहन राकेश अंदर से इतने खाली-खाली क्यों महसूस करते हैं? उनके डायरी लिखने में अजीब-सी कशिश है। बेकरारी है। जिन सपनों को वह साथ-साथ देखते चलते हैं, उनके अधूरे रह जाने की टीस है। वह अंदर-ही...
Shachinder Arya
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थोड़ी देर झूठ बोलना चाहता हूँ। कहीं से भी कोई आवाज़ सुनाई न दे। सब चुपचाप सुनते रहें। कहीं से छिपकर मेरी आवाज़, उनके कान तक आती रहे। उन्हे दिखूँ नहीं। बस ऐसे ही छिपा रहूँ। पता नहीं यह कितनी रात पुरानी रुकी हुई पंक्ति है। इसे लिखना चाहता था, ‘रोक दी है’। जैसे, इतने दिन...
Shachinder Arya
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पीछे से बाक़ी ..लिखने का मन कल रात था। पर लिख नहीं पाया। सो गया। थका था। अभी भी इतना ख़राब लिखकर नीचे से आया, तब से सोच रहा हूँ, ऐसा क्या है, जो उसमें कम है? वहाँ क्या कह दिया, जिसके लिए वहाँ जगह नहीं थी। पता है हम लोग हार रहे हैं। हारे हुए लोग हैं। कभी-कभी ख़ुद को बच...
Shachinder Arya
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इस शीर्षक को सवाल की तरह ही देख रहा हूँ। इसमें कोई जवाब नहीं छिपा है। फ़िर भी, इसे घूरे जा रहा हूँ। मार्च का पाँचवा दिन सुबह के यही कोई साढ़े नौ बज रहे हैं। कितने दिन हो गए यहाँ आए? अभी गिने नहीं हैं। उन्हे गिनने के लिए उँगलियाँ कम नहीं पड़ेंगी। पर क्या करूँ, नहीं देख...