ब्लॉगसेतु

राजीव सिन्हा
145
“अतीत की रीसती छत से मेरा वर्तमान ठोप- ठोप टपक रहा भविष्य के पेंदाहीन पात्र में” अभियन्यु अनत ( मॉरीशस  के कवि ) कुली लाइंस एक साहित्यिक पुस्तक भर नहीं है, बल्कि इतिहास के उस दौर का चलचित्र (मनमोहन देसाई मार्का  नहीं, बल्कि आर्ट मूवी की तरह) है, जिससे क...
 पोस्ट लेवल : समकालीन लेखन
राजीव सिन्हा
145
            बनारस में एक प्रचलित कहावत है, “बड़ा तेज बनत रहलन, ससुर दक्खिन लग गईलन”! यहां दक्खिन लगने का मतलब पीछे हो जाना, लक्ष्य की प्राप्ति न होना, समाप्त हो जाना या प्रतिष्ठा की हानि। विमर्श के दौरान अपने बनारसी मित्रो ने भारत के कुछ दक्षिणी हिस्से क...
 पोस्ट लेवल : समकालीन लेखन
दिनेशराय द्विवेदी
54
वकालत में 40 साल से ऊपर हो गए हैं। कॉलेज छोड़े भी लगभग इतना ही अरसा हो गया। वकालत के शुरू में हाथ से बहुत लिखा। उस वक्त तो दरख्वास्तें और दावे भी हाथ से लिखे जा रहे थे। टाइप की मशीनें आ चुकी थीं। फिर भी हाथ से लिखने का काम बहुत होता था। मैं टाइप कराने के पहले दावे...
kumarendra singh sengar
26
बहुत बार ऐसा होता है जबकि बिना किसी व्यस्तता के भी व्यस्तता समझ आती है. समझ नहीं आता कि चौबीस घंटे का समय कहाँ, कैसे निकल जाता है. दिन भर के क्रियाकलापों पर नजर डाली जाये तो कुछ भी ऐसा समझ नहीं आता है कि महसूस हो कि अति-व्यस्त रहने वाला काम किया है. इसके बाद भी ऐसा...
 पोस्ट लेवल : ब्लॉग-लेखन मानसिकता
अनंत विजय
56
कुछ वर्ष पहले की बात है, शायद 2017 की, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हिंदी के सर्वाधिक समादृत लेखकों में से एक नरेन्द्र कोहली जी का साक्षात्कार का अवसर मिला था। वो साक्षात्कार कोहली जी के समग्र लेखन पर था, लिहाजा मुझे ये छूट मिल गई थी कि मैं प्रश्नों को अपने मन मुताबि...
राजीव सिन्हा
145
डोरबेल की सुमधुर संगीत-लहरी भी उमा के चित्त को अशांत होने से रोक न सकी।अभी-अभी तो वह पूजा करने बैठी थी। फिर यह व्यवधान..? ! नौकर उसके सामने शादी का एक कार्ड धर गया। गहरे पीले रंग पर लाल बनारसी काम के बॉर्डर से सजे उस कार्ड को उमा ने उत्सुकता से देखा। एड्रेस वाली जग...
kumarendra singh sengar
26
लेखन बहुत छोटे से ही शुरू हो गया था. उस समय लगभग दस साल की उम्र रही होगी जबकि एक कविता महज तुकबंदी करते हुए लिखी गई थी. पिताजी ने वह कविता प्रकाशन हेतु भेजी और शायद हमारे लेखन को पिताजी का आशीर्वाद मिलना था, प्रोत्साहन मिलना था कि वो कविता प्रकाशित भी हुई. दो-दो सम...
राजीव सिन्हा
145
बुढ़ापे में चलने की ताकत भी कहाँ बची थी। पर नफीसा आज रुक भी तो नहीं सकती थी। आखिर उसने बड़ी मुश्किल और जद्दोजहद के बाद यह ठाना था। हाँफते लड़खड़ाते उसके कदम बस मंजिल तक पहुँचकर ही दम लेना चाहते थे। मंजिल....इसे लेकर भी तो नफीसा निश्चिंत नहीं थी। सोच रही थी....पता नह...
रविशंकर श्रीवास्तव
4
..............................
रविशंकर श्रीवास्तव
4
..............................