ब्लॉगसेतु

कुमार मुकुल
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वैश्विक हताशा की परिणतियों का दस्‍तावेज वैश्वीकरण की चमकीली आँधी अब अपने तीसरे दशक की आख़िरी पारी खेल रही है। कारपोरेट लालच और उपभोक्तावाद चरम पर हैं। जो लोग बाज़ार के गृहप्रवेश से सदमे में थे वे अब अपने मोबाइल  फ़ोन के स्क्रीन पर तरह-तरह की चीजें देखकर गूँगे...
Ravindra Prabhat
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लखनऊ (25 अगस्त) :  हिन्दी भाषा की विविधता, सौन्दर्य, डिजिटल और अंतराष्ट्रीय स्वरुप को विगत 14 वर्षों से वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठापित करती आ रही लखनऊ की संस्था परिकल्पना के 13वीं वार्षिक महासभा में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे लखनऊ परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ श्र...
शिवम् मिश्रा
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 ऐ मेरे वतन के लोगों एक हिन्दी देशभक्ति गीत है जिसे कवि प्रदीप ने लिखा था और जिसे संगीत सी॰ रामचंद्र ने दिया था। ये गीत चीन युद्ध के दौरान मारे गए भारतीय सैनिकों को समर्पित था। यह गीत तब मशहूर हुआ जब लता मंगेशकर ने इसे नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस के अवसर प...
विजय राजबली माथुर
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 Tukaram VermaTukaram Verma19-12-2018  "राजनीति और अच्छे लोग " कितना प्रभावकारी और संतुष्टि प्रदायक लगता है यह वाक्य| अपने आप विचार कीजिये कि अच्छे लोगों की तलाश में आंदोलनों के गर्भ से जितने युवा राजनैतिक क्षेत्र को मिले उनमें से कितने लोग राष्...
Pratibha Kushwaha
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बारह हजार करोड़ की रेमंड ग्रुप के मालिक 78 वर्षीय विजयपत सिंघानिया एक-एक पैसों के लिए मोहताज हो गए। उनके बेटे गौतम ने उन्हें न केवल घर से बेदखल कर दिया बल्कि गाड़ी व उनका ड्राइवर तक छीन लिया। मजबूर होकर विजयपत को बाम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर करके मुंबई स्थित एक घर...
Sanjay  Grover
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बड़ों ने कहा कि अच्छे लोगों में उठो, बैठो।तभी से मैं अकेला रह रहा हूं।-संजय ग्रोवर 17-04-2018
अजय  कुमार झा
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महंत सुन्दर दास ...धर्म और आस्था के नाम पर आडम्बर और धूर्तता से अकूत धन संपत्ति का मालिक बना एक और पाखंडी , इन दिनों चर्चा में है .....कारण भी कोई नया नहीं ...स्त्री का शोषण | समझ में नहीं आता कि इन हैवानों पर क्रोध किया जाए या उन मूर्ख महिलाओं , स्त्रियों , युवतिय...
Sanjay  Grover
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लघुव्यंग्यभीड़-भरी बस में चढ़ते हुए लोग- ‘पहले चढ़ने दो भई, जानते नहीं चढ़ना कितना ज़रुरी है !?’भीड़-भरी बस से उतरते हुए लोग- ‘पहले उतरने दो भई, हम उतरेंगे नही तो आप चढ़ोगे कैसे !?’-संजय ग्रोवर22-07-2017
अजय  कुमार झा
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बहती नदी के संग तू बहता जा ,मन तू अपने मन की कहता जा ,न रोक किसी को ,न टोक किसी को,थोडा वो झेल रहे ,थोडा तू भी सहता जा ..वर्तमान में सोशल नेट्वर्किंग साईट्स पर ,उपस्थति बनाए रखने , किसी भी वाद विवाद में पड़ने , तर्क कुतर्क के फेर में समय खराब करने से बहुत बेहतर यही...
अजय  कुमार झा
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कुछ फुटकर नोट्स                    चार दिन की ज़िंदगी,संभाल के खर्च किया करो,            व्हाट्सअप ,फेसबुक,के साथ ब्लॉग को भी समय दिया करो ..आप लौट रहे हैं न अपने अपने अंतर्जालीय डायरी क...