ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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तबीयत कल के मुक़ाबले काफ़ी दुरुस्त है। बस अब मन ठीक करना रह गया है। अभी इतनी उम्र नहीं हुई पर बचपन की यादें अब गड्ड-मड्ड होने लगी हैं। मुझे बचपन की कहानियाँ पढ़ना पसंद हैं, जैसी उदय प्रकाश ने लिखी हैं। तिरीछ या डिबिया या मौसा जी या ऐसी बहुत। शायद ख़ुद की नहीं लिख पाया...
Shachinder Arya
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कानपुर कभी किसी याद का हिस्सा नहीं रहा। सिर्फ़ एक छोटी-सी धुँधली तस्वीर में दादी के चले जाने के बाद, रात दो बजे कानपुर से लखनऊ की तरफ़ भागती रोडवेज़ बस में बोनट पर गुजरी असहाय यात्रा के कुछ याद नहीं। उसमें कानपुर कहीं नहीं है। सिर्फ़ लंबी काली सड़कें, घूमते पहिये और चमक...
Shachinder Arya
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कल बस इतना कहा था किताबें पढ़ना छोड़ दिया है। यह कहीं नहीं लिखा के उन्हे खरीदना भी बंद कर दिया है। शायद उन्हे अभी इकट्ठा कर, कभी इत्मीनान से कहीं बैठकर कहीं से भी पढ़ने लग जाऊँ। यह किन अर्थों में विरोधाभासी व्याघातक बात है, पता नहीं। शायद हम सब इन्ही के भीतर बनते-बिगड़...
Shachinder Arya
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धीरे-धीरे अँधेरा बढ़ रहा है। ठंड भी नीचे उतर आई है। सूरज ढले कई पहर बीत गए हो जैसे। या ऐसी कोई चीज़ उस जगह ने कभी देखी ही नहीं है। पता नहीं यह क्या था। बस अँधेरे की तरह दिख रहा है। हमें जल्द ही वहाँ से चल पड़ना होगा। ताकि आगे कोई होटल मिल सके। पर दिक्कत है अभी तक पीछे...
Shachinder Arya
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नींद आ रही है पर लेटुंगा नहीं। क्योंकि पता है लेटने पर भी वह आने वाली नहीं है। इधर वह ऐसे ही परेशान करने लगी है। करवट-करवट बस उबासी आती है नींद नहीं। और फ़िर जब यादें खुली आँखों से आस पास तैर रही हों तो सोने की क्या ज़रूरत। ऐसे ही कल हम मनाली थे। माल रोड घूम रहे थे।...
Shachinder Arya
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जगहें वही रहती हैं उनके किरदार बदल जाते हैं। हमारा कॉलेज उसी जगह था जहाँ बीते तीन महीने से उसे देखते आ रहे थे। कहीं से भी थोड़ा भी अलग नहीं लग रहा था। पर कुछ उस दिन में ही था जो उसे अंदर ही अंदर बदल रहा था। शाम धीरे धीरे वहाँ उतर रही थी। जैसे उस जगह पहले कभी उतरते न...