ब्लॉगसेतु

अनीता सैनी
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आहत हुए अल्फ़ाज़ ज़माने की आब-ओ-हवा में,  लिपटते रहे  हाथों  में और  सीने में उतर गये, अल्फ़ाज़ में एक लफ़्ज़ था मुहब्बत, ज़ालिम ज़माना उसका साथ छोड़ गया,   मुक़द्दर से झगड़ता रहा ता-उम्र वह,  मक़ाम मानस अपना बदलता गया,&nbs...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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हटाओ फूलजो बने प्लास्टिक से देखो बगिया,आ गया है सावनज़ख़्मों का मरहम। आये उमड़मेघदूत नभ मेंलाये सन्देश,शोख़ लफ़्ज़ सुननेथी सजनी बे-सब्र।पवन चलीखुल गयी खिड़कीफुहार आयी,भिगोया तन-मनबारिश में अगन।मेघ मल्हार साथ आयी बहार बोले पपीहा, है घटा घनघोरनाचे झ...
गौतम  राजरिशी
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कैसे तो कैसे बीत जाता है ये कमबख़्त वक़्त और हम खर्च होते रहते हैं इसके इस बीतते जाने में...नामालूम से | पता भी नहीं चला और इस ब्लौग पर लिखते-लिखते छ साल हो गए | तो "पाल ले इक रोग नादां..." की छठी पर एक पुरानी ग़ज़ल :- उफ़ ये कैसी कशिश ! बेबसी ? हाँ वही !बेख़ुदी ? ब...