ब्लॉगसेतु

Yashoda Agrawal
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ये गूंगी मूर्तियाँजब से बोलने लगी हैंन जाने कितनों कीसत्ता डोलने लगी हैजुबान खोली हैतो सज़ा भी भुगतेंगीअब छुप छुपा कर नहींसरे आम...खुली सड़क परहोगा इनका मान मर्दनकलजुगी कौरवों की सभासिर्फ ठहाके ही नहीं लगाएगीबल्कि वीडियो भी बनाएगीअपमान और दर्द की इन्तहा मेंये मूर्त...
Yashoda Agrawal
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काट दिये पर  सिल दी गयीं जुबानें और आँखों पर पट्टी भी बाँध दीइस सबके बाद दे दी हाथ में कलम कि लो अब लिखो निष्पक्ष हो कर तुम्हारा फैसला जो भी हो बेझिझक लिखना -:-  गूंगे बहरे लाचार आपके रहमो करम पर जिन्दा लोग क्य...
Yashoda Agrawal
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काश कि हम लौट सकें अपनी उन्ही जड़ों की ओर जहाँ जीवन शुरू होता था  परम्पराओं के साथ और फलता फूलता था  रिश्तों  के साथ **मधुर मधुर मद्धम मद्धम  पकता था  अपनेपन की आंच में  मैं-मैं और-और की भूख से परे&nb...
Yashoda Agrawal
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काट कर पत्थरनदी होकर जनमनाफिर ठोकरें खाते हुएदिन रात बहनाऔर बहते बहतेना जाने कितना कुछअच्छा - बुरासब समेटते जानाऔर बहुत कुछपीछे भी छोड़ते जानानदी बने रहने की प्रक्रिया  मेंबहुत कुछ छूट जाता हैबहुत कुछ टूट जाता हैसच....नदी होनाआसान नहीं होता-मंजू मिश्रा
Yashoda Agrawal
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बरस महीने दिन छोटे छोटे होते अदृश्य ही हो जाते हैं और मैं बैठी रहती हूँ अभी भी उनको उँगलियों पे गिनते हुए बार बार हिसाब लगाती हूँ मगरजिन्दगी का गणित है किसही बैठता ही नहीं-मंजू मिश्रा
Yashoda Agrawal
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मुक्त करो पंख मेरे पिजरे को  खोल दोमेरे सपनो से जरा पहरा हटाओ तो ...आसमाँ को  छू के मैं तो तारे तोड़ लाऊंगीएक बार प्यार से हौसला बढाओ तो ... बेटों से नहीं है कम बेटी किसी बात मेंसुख हो या दुःख सदा रहती हैं साथ मेंवंश सिर्फ बेटे ही चलाएंगे न सोचनाभला...
Yashoda Agrawal
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अपेक्षाएंजब प्रेम सेबड़ी होने लगती हैंतबप्रेम धीरे धीरेमरने लगता हैविश्वासघटने लगता हैप्रेम में तोल-मोलजांच-परखघर कर लेती हैतो प्रेमप्रेम नहीं रह जाताविश्वास विहीन जीवनकब असह्य हो जाता हैपता ही नहीं चलताजब पता चलता हैतब तकबहुत देर हो चुकी होती हैसिर्फ पछतावा हीशेष...
Yashoda Agrawal
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रोज़ एक मेंढक खाइए!...ऊपर वाली लाइन पढ़कर चौंकिए नहीं. सुबह उठने पर आपको सबसे पहला काम यही करना है… आपको एक मेंढक खाना है.ओह! तो आप भी मेरी तरह शाकाहारी हैं… कोई बात नहीं… फिर भी आप सुबह-सुबह एक मेंढक खा सकते हैं.शायद मार्क ट्वेन ने ही यह कहा था, “यदि आपका दिन का स...
Yashoda Agrawal
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हाँ भूल चुकी हूँ तुम्हेंपूरी तरह सेवैसे हीजैसे भूल जाया करते हैं बारहखड़ीतेरह का पहाड़ाजैसे पहली गुल्लक फूटने पर रोनाफिर मुस्कानाघुटनों पर आई पहली रगड़गालों पे पहली लाली का आनातितली के पंखों की हथेली पर छुअनटिफिन के पराठों का अचार रसा स्वादवो पहली पहल शर्माना..पर जाने...
Yashoda Agrawal
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वो जो है ख्वाब साख़याल साधड़कन सासिरहन सासोंधी खुशबू सानर्म हवाओं सासर्द झोकों सामद्धम सी रौशनी सालहराती सी बर्क़ साबिस्तर की सिलवटों साबाहों में लिपटे तकिए साजिस्म की बेतरतीब चादर सासुबहों की ख़ुमारी साशाम की बेक़रारी सासरकती सी रात साठहरी सी दोपहर साकाश कभी मिल ज...