ब्लॉगसेतु

अनीता सैनी
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 वासंती परिधान पहनकरक्षिति दुल्हन-सी शरमाई है शीश मुकुट मंजुल सुमनों का मृदुल हास ले मुसकाई है ।।पोर-पोर शृंगार सुशोभितसुरबाला कोई आई हैमुग्ध घटाए बहकी बहकीघट भर सुषमा छलकाई है।।शाख़-शाख़ बजती शहनाई सौरभ  गंध उतर आई  हैमंद मलय मगन लहराएप...
Sandhya Sharma
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पलाश की डालियों पर                         सज गए हो तुमदहक रहे होपूरे जंगल मेंमुझे पता हैकोई आये न आयेतुम ज़रूर आओगेसब कुछ बदल जायेगापर तुम न बदलोगेबने रहोगे तुमजस के तसआओ तुम्हारास्वागत है वसंत ...आप...
 पोस्ट लेवल : पलाश वसंत जंगल
हिमांशु पाण्डेय
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तेरी सुरभि वहन कर लायी शीतल मलय बयार,भारती तेरी जय हो! तेरी स्मृति झंकृत कर जाती उर वीणा के तार भारती तेरी जय हो!अरुणोदय में सुन हंसासिनी तव पदचाप विहंगथिरक थिरक गा रहा प्रभाती पुलकित सारा अंग तेरे स्वागत में खिल जाती कुसुम कली साभार- भारती तेरी...
jaikrishnarai tushar
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सर्वप्रथम मेरा यह गीत नवनीत में आदरणीय श्री विश्वनाथ सचदेव जी ने प्रकाशित किया था |फिर मेरे गीत संग्रह में प्रकाशित हुआ |अभी हाल में फरवरी अंक में इंदौर से प्रकाशित वीणा में यह प्रकाशित है |  चित्र -साभार गूगल अबकी शाखों पर वसंत तुम एक गीत -अबकी...
jaikrishnarai tushar
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 चित्र -साभार गूगल एक गीत -अबकी शाखों पर वसंत तुम अबकी शाखों पर वसंत तुम फूल नहीं रोटियाँ खिलाना |युगों -युगों से प्यासे होठों को अपना मकरंद पिलाना |धूसर मिट्टी की महिमा पर कालजयी कविताएं लिखना ,राजभवन जाने से पहले&...
देवेन्द्र पाण्डेय
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यूं ही नहीं आता वसंतलड़नी होती है, लंबी लड़ाईधूप कोकोहरे के साथ।लगने लगता हैहार गया कोहरातभी नहीं दिखतीधूपलगने लगता हैगई ठंडीछाने लगता हैघना कोहरायूँ ही नहीं आता मगर तय हैकोहरे को हराकरआता है एक दिनवसंत।
 पोस्ट लेवल : बसंत कविता वसंत
Ashok Kumar
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वसंत सकरगाए जीवन जगत की बेहद साधारण वस्तुओं में असाधारणता रोप देने वाले कवि हैं. अपने अलमस्त और लगभग लापरवाह स्वभाव के विपरीत कविताओं में वह बेहद सावधान हैं, लेकिन यह चालाक नहीं मासूम सावधानी है एक क़स्बाई व्यक्ति की जिससे गुज़रते हुए आप थोड़ा और सहज हो जाते हैं. कभी...
 पोस्ट लेवल : नई किताब वसंत सकरगाए
Kavita Rawat
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PRABHAT KUMAR
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क्यों वसंत! तुम जाने की तैयारी कर रहे हो? अभी तो आये थे और इतनी जल्दी....फिर जाने भी लगे। अभी तो मैं तुम्हें ढंग से निहार भी नहीं सका। बताओ मुझे किससे कहना है कि तुम यूँ ही ठहर जाओ। मान भी जाओ....क्या तुम्हें खुद पर गरूर है इसलिए क्योंकि सब तुम्हारा इंतजार करते हैं...
 पोस्ट लेवल : वसंत चिंतन
Kavita Rawat
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 पोस्ट लेवल : भोपाल उत्सव वसंत लेख