ब्लॉगसेतु

संतोष त्रिवेदी
0
किसान घणे बावले हो रहे हैं।एक तो कोई मसला है ही नहीं फिर भी कोई बनता है तो आपसदारी से हम सुलटा लेंगे।वे बिला वजह इसे ‘इंटरनेशनल’ बनाने लग रहे हैं।हमारी सरकार शुरू से चाह रही है कि वो बात करें।बारह बार कर भी चुकी है।चौबीस बार और कर लेगी।बात करने से सरकार पीछे ना हट...
संतोष त्रिवेदी
0
कहते हैं मुसीबत अकेले नहीं आती।एक ठीक से जा भी नहीं पाती कि दूसरी और ‘बेहतर’ तरीक़े से दबोच लेती है।पहले वायरस से बचने की मुसीबत थी फिर मुई वैक्सीन आ गई।कह रहे हैं कि पचास-पार वालों को पहले लगेगी।ये भी कोई बात हुई ! लगता है वायरस से तो बच गए पर इससे बचना मुश्किल है...
Sanjay  Grover
0
लोगों को बताया गया कि कुछ न कुछ करते रहो, ख़ाली मत बैठो नही तो पागल हो जाओगे.शताब्दियां बीत गई पर लोगों की खोपड़ियों में से यह बात नहीं निकली. अब वे भले पागलपन करते रहें पर ख़ाली कभी नहीं बैठते.-संजय ग्रोवर
समीर लाल
0
 जैसे एक आदमी होते हैं कई आदमी उसी तरह एक युग में होते हैं कई युग. कलयुग के इस सेल्फी युग में जब व्यक्ति फोन खरीदने निकलता है तब उसमें फोन की नहीं, उस फोन में लगे कैमरे की खूबियाँ देखता है.. फोन की साऊन्ड क्वालिटी में भले ही थोड़ी खड़खड़ाहट हो, चाहे जगह जगह सिगनल...
समीर लाल
0
 जिन्दगी का सफ़र भी कितना अजीब है. रोज कुछ नया देखने या सुनने को मिल जाता है और रोज कुछ नया सीखने. पता चला कि दफ्तर की महिला सहकर्मी का पति गुजर गया. बहुत अफसोस हुआ. गये उसकी डेस्क तक. खाली उदास डेस्क देखकर मन खराब सा हो गया. आसपास की डेस्कों पर उसकी अन्य करीब...
संतोष त्रिवेदी
0
यह अच्छा ही हुआ कि हमारे यहाँ ‘लोकतंत्र के मंदिर’ के निर्माण की इजाज़त मिल गई।देश में लोकतंत्र का निबाह हो और उसका मंदिर न हो,यह निहायत बचकानी बात है।ऐसा नहीं है कि हमारे यहाँ पहले ‘लोकतंत्र का मंदिर’ था ही नहीं, पर लोकतंत्र की तरह वह भी बहुत पुराना हो गया है।कई बा...
संतोष त्रिवेदी
0
नया साल आ गया है,साथ में नए संकल्प भी।जिसे देखो वही एक-दो संकल्प उठाए घूम रहा है।नए साल में कठिन से कठिन संकल्प लिए जाते हैं ताकि उनके पूरा न होने पर कम से कम ग्लानि का अनुभव हो।ढके और छुपे चेहरों से ग्लानि का कोई भाव वैसे भी नहीं दीखता।इससे यही ज़ाहिर होता है कि ए...
सतीश सक्सेना
0
शायद यह अकेला समाज है जहाँ ऊपरी दिखावे को सम्मान देना सिखाया जाता है ! अगर सामने से कोई गेरुआ वस्त्र धारी और पैर में खड़ाऊं पहने आ रहा है तो पक्का उस महात्मा के चरणों में झुकना होगा और आशीर्वाद मांगना ही है चाहे वह बुड्ढा पूरे जीवन डाके डालकर दाढ़ी बढ़ाकर छिपने के लिए...
समीर लाल
0
 किसी ने कहा है कि अगर ससम्मान जीवन जीना है तो वक्त के साथ कदमताल कर के चलो अर्थात जो प्रचलन में है, उसे अपनाओ वरना पिछड़ जाओगे. अब पार्ट टाईम कवि हैं, तो उसी क्षेत्र में छिद्रान्वेषण प्रारंभ किया. ज्ञात हुआ कि वर्तमान प्रचलन के अनुसार, बड़ा साहित्यकार बनना है त...
sanjiv verma salil
0
एक रचनाघुटना वंदन*घुटना वंदन कर सलिल, तभी रहे संजीव।घुटने ने हड़ताल की, जीवित हो निर्जीव।।जीवित हो निर्जीव, न बिस्तर से उठने दे।गुड न रेस्ट; हो बैड, न चलने या झुकने दे।।छौंक-बघारें छंद, न कवि जाए दम घुट ना।घुटना वंदन करो, किसी पर रखो न घुटना।।*मेदांता अस्पताल दिल्ली...