ब्लॉगसेतु

कुमार मुकुल
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रोजाना ना जाने कितनी कितनी बार उसकी धज्जियां सरेआम व सरेशाम उड़ायी जाती हैं पर धज्जियों का यह बादशाह कभी हार नहीं मानता। रावण के सिर की तरह उसकी धज्जि‍यां हमेशा उग-उग आती हैं। रक्‍तबीज की तरह अपनी हर बूंद से वह बहुगुणित होता जाता है। उसकी धज्जियां उडाकर सब प्र...
 पोस्ट लेवल : व्‍यंग्‍य-मुकुल
Kajal Kumar
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कुमार मुकुल
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तो भैया अब और कितना डिजि टल-मल विकास चाहते हैं। धरती पर 'स्‍वच्‍छ भारत' चलाते-चलाते हमने अंतरिक्ष में कचरा फैलाने की क्षमता हासिल कर ली है। मिशन शक्ति पर नासा का प्रहार अमेरिकी दुष्‍प्रचार और प्रोपे गैंडा है। भाई यह अमेरिकी गैंडा तो बड़ा खतरनाक लग रहा। अब अपने मो...
 पोस्ट लेवल : व्‍यंग्‍य-मुकुल
कुमार मुकुल
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क्‍या पाकिस्‍तान शेर है ? नहीं जी, गीदड़ है। पर चुनाव तक उसे शेर मानने में अपुन के बाप का क्‍या जाता है। इसी तरह चुनाव में अपुन सवा सेर साबित हो जाएंगे! फिर इन गीदडों को कौन पूछेगा ? ये सीमा पर फूं फां करते रहेंगे लोहा लेने को अपने जवान हैं इतने, हम उनकी शहादत क...
कुमार मुकुल
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चैट पर एक दिन उसने लिखा कि मुझसे मिलने के लिए आपको करना पड़ेगा कयामत का इंतिजार।फिर तो अगली सुबह मैं निकल पड़ा कयामत की खोज में। और राह में जो भी गिरजा,महजिद और शिवाला पड़ा सब में झुक-झुक के अरदास कर डाला कि जल्‍दी कहीं से बुलवा दे कयामत को और करने लगा उसका इंतिजार...
 पोस्ट लेवल : व्‍यंग्‍य-मुकुल
संतोष त्रिवेदी
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वे पहले बंगला पकड़े थे,फिर टोंटी पकड़ ली।बंगलाविहीन तो हुए पर टोंटी हाथ लग गई।भागे भूत की लँगोटी भली।कभी उनके दोनों हाथों में लड्डू थे,आज टोंटी है।इस पर विरोधी उखड़ गए।गड़े मुर्दे उखाड़ने लगे।वे चाहते हैं जैसे उन्होंने कुर्सी छोड़ी,बंगला छोड़ा,अब टोंटी भी छोड़ दें।...
संतोष त्रिवेदी
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देश भर में चौतरफ़ा जश्न का माहौल है।बहुत दिनों बाद ऐसा संयोग आया,जब पक्ष-विपक्ष दोनों ख़ुश दिखे।इससे भी बड़ी बात यह कि ऐसा मौक़ा दोनों पक्षों को बिना कुछ किए मिला है।संयोग से सत्ता-पक्ष के चार साल बीत गए।वह इसे अड़तालीस महीने समझकर ख़ुश है।उसके लिए विकास की यह लम्ब...
संजीव तिवारी
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' माइक्रोकविता और दसवाँ रस' साहित्यकारों के लिए उपादेय है। रचनाकर्म साधना नहीं, साधारण है; स्पष्ट करेगी। परंतु साधारण का साधारणीकरण ही काव्य होता है। यह विश्लेषण ' माइक्रोकविता और दसवाँ रस' में मिलेगा। इसे जानने के पहले हम कविता पर मैनेजर पाण्डेय की टिप्पणी याद कर...
 पोस्ट लेवल : कुबेर व्‍यंग्‍य
संतोष त्रिवेदी
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दिल्ली में डेंगू है और उससे ज़्यादा उसका डर।डेंगू का डंक अभी टूटा नहीं पर स्वाइन फ्लू की आहट सुनाई देने लगी है।राजधानी का स्टेटस वीआईपी है सो बीमारी भी वीआईपी।छोटे-मोटे लोगों से काबू में आने को राजी नहीं है।मुख्यमंत्री विज्ञापन दे रहे हैं पर डेंगू मान नहीं रहा है।नि...
संतोष त्रिवेदी
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चुनाव सिर पर हों और शो-बाजी न हो,यह कैसे हो सकता है ! सबने अपने-अपने घोड़े खोल दिए हैं।यह तो चुनाव बाद ही पता चल पाएगा कि ये घोड़े थे या गधे।हमारे यहाँ घोड़े खोलने की परम्परा प्राचीनकाल से है।तब चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए अश्वमेध का आयोजन होता था।जो राजा का घोड़ा पकड़...