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सुमन कपूर
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..ज़ख्मों को कुरेदती हूँ तो दर्द सकून देता है !!सु-मन 
सुमन कपूर
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छलता है 'मन' यूँ ही मुझको बारहा लफ्ज़ों से फिर बेरुखी छलकने लगती है !!सु-मन 
सुमन कपूर
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तमाम खुशियों के बावजूद गम हरा है अभीजिंदगी की सूखी सतह पर नमी बाकी है शायद ।।सु-मन 
सुमन कपूर
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असल में हम अपने ही कहे शब्दों से धोखा खाते हैं और हमारे शब्द हमारी चाह से ।हम सब धोखेबाज़ हैं खुद अपने !!सु-मन
सुमन कपूर
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शाम खामोश होने को है और रात गुफ्तगू करने को आतुर ... इस छत पर काफी शामें ऐसी ही बीत जाती हैं ...आसमां को तकते हुए .... सामने पहाड़ी पर वो पेड़ आवाज लगाते हैं ..कुछ उड़ते परिदों को ..आओ ! बसेरा मिलेगा तुम्हें ..पर परिंदे उड़ जाते हैं दूर उस ओर ... अपने साथी संग .. सुनसा...
सुमन कपूर
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                         दोस्त वह जो जरूरत* पर काम आये ।                         सोच में हूँ कि मैं / हम जरूरत का सामान हैं । जरूरत पड़ी...
सुमन कपूर
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                           सुबह और रात के बीच बाट जोहता एक खाली दिन ... इतना खाली कि बहुत कुछ समा लेने के बावजूद भी खाली .... कितने लम्हें ..कितने अहसास ...फिर भी खाली ... सूरज की तपिश से भी अतृप...
सुमन कपूर
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एक कहानी होती है । जिसमें खूब पात्र होते हैं । एक निश्चित समय में दो पात्रों के बीच वार्तालाप होता है । दो पात्र कोई भी वो दो होतें हैं जो कथानक के हिसाब से तय होते हैं । कथानक कौन लिखता है... उन किसी को नहीं मालूम । मालूम है तो बस इतना कि उस लिखे को मिटाया नहीं जा...
सुमन कपूर
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आजकल बहुत सारे शब्द मेरे ज़ेहन में घूमते रहते हैं इतने कि समेट नहीं पा रही हूँ अनगिनत शब्द अंदर जाकर चुपचाप बैठ गए हैं । एक दोस्त की बात याद आ रही है जब कुछ अरसा पहले यूँ ही शब्द मेरे ज़ेहन में कैद हो गए थे ।उसने कहा था , ' सुमी ! अक्सर ऐसा होता है जब बहुत सारे शब्द...
सुमन कपूर
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पिछले 2-3 बरस के सहेज कर रखे सामान को टटोला तो पाया कि वक़्त के साथ-साथ बदलने लगा है सब । उस वक्त के सहेजे इस सामान में फफूंद लगने लग गई है । बहुत बचा के रखा था कि बेशकीमती ये सामान यूँ ही नया नया रहे । पर इक उम्र होती है हर चीज़ की, उसके बाद वो न...