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shashi purwar
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अर्थ घनत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं "जोगिनी गंध" के हाइकु - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'वर्तमान युग परिवर्तन का युग है और परिवर्तन की यह प्रक्रिया जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में है। साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि बदलते परिवेश में...
sanjiv verma salil
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पुरोवाक'भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ ' समय का किस्सा सही हूँ  आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'*                विश्ववाणी हिंदी के समसामयिक साहित्य की लोकप्रिय विधाओं में से एक नवगीत के उद्यान में एक नया पुष्प खिल रहा है, शशि पुर...
 पोस्ट लेवल : नवगीत शशि पुरवार
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चला बटोही कौन दिशा मेंपथ है यह अनजाना जीवन है दो दिन का मेलाकुछ खोना कुछ पानातारीखों पर लिखा गया हैकर्मों का सब लेखापैरों के छालों को रिसते कब किसने देखाभूल भुलैया की नगरी मेंडूब गया मस्तानाजीवन है दो दिन का मेलाकुछ खोना कुछ पानामृगतृष्णा के गहरे बादलहर पथ पर छितरा...
sanjiv verma salil
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जोगनी गंधशशि पुरवारजन्म तिथि: 22 जून 1973 ई.।जन्म स्थान: इंदौर, मध्य प्रदेश। शिक्षा: स्नातक- बी.एस-सी.विज्ञान।स्नातकोत्तर:एम.ए.राजनीति, 1⁄4देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर1⁄2 तीन वर्षीय हानर्सडिप्लोमा इन कम्प्यूटर साफ्टवेयर एंड मैनेजमेंट।भाषा ज्ञान: हिंदी, मर...
sanjiv verma salil
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पुरोवाक :'जोगिनी गंध' - त्रिपदिक हाइकु प्रवहित निर्बंध  आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'*भाषा सतत प्रवाहित सलिला की तरह निरंतर परिवर्तनशील होती है। लोकोक्ति है 'बहता पानी निर्मला', जिस नदी में जल स्रोतों से निरंतर ताजा जल नहीं आता और सागर में जल र...
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sanjiv verma salil
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कार्यशाला : दोहा - कुण्डलिया*अपना तो कुछ है नहीं,सब हैं माया जाल। धन दौलत की चाह में,रूचि न सुख की दाल।।  -शशि पुरवार रुची न सुख की दाल, विधाता दे पछताया।मूर्ख मनुज क्या हितकर यह पहचान न पाया।।सत्य देख मुँह फेर, देखता मिथ्या सपना।चाह न सुख संतोष...
shashi purwar
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आँखों में अंगार है, सीने में भी दर्दकुंठित मन के रोग हैं, आतंकी नामर्द१ व्यर्थ कभी होगा नहीं, सैनिक का बलदानआतंकी को मार कर, देना होगा मान२ चैन वहां बसता नहीं, जहाँ झूठ के लालसच की छाया में मिली, सुख की रोटी दाल३ लगी उदर में आग है, कंठ हुए...
sanjiv verma salil
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एक कुंडली- दो रचनाकार दोहा: शशि पुरवार रोला: संजीव *सड़कों के दोनों तरफ, गंधों भरा चिराग गुलमोहर की छाँव में, फूल रहा अनुरागफूल रहा अनुराग, लीन घनश्याम-राधिकादग्ध कंस-उर, हँसें रश्मि-रवि श्वास साधिकानेह नर्मदा प्रवह, छंद गाती मधुपों केगंधों भरे च...
shashi purwar
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१शहरों की यह जिंदगी, जैसे पेड़ बबूलमुट्ठी भर सपने यहाँ, उड़ती केवल धूलउड़ती केवल धूल, नींद से जगा अभागाबुझे उदर की आग, कर्म ही बना सुहागाकहती शशि यह सत्य, गूढ़ डगर दुपहरों कीकोमल में के ख्वाब, सख्त जिंदगी शहरों की२चाँदी की थाली सजी, फिर शाही पकवानमाँ बेबस लाचार थी, दंभ...