ब्लॉगसेतु

मुकेश कुमार
172
हो बेहद खूबसूरतइतना ही तो कहा थाकि बोल उठीलजाती भोर सीहल्की गुलाबी स्नेहिल प्रकाश के साथरंग बिखेरती हुई- ब्यूटी लाइज इन द आइज ऑफ द बीहोल्डरतत्क्षणआंखों की पुतलियों संगछमकते प्रदीप्त काली चकमक संगमरमर सीकोर्निया और रेटिना के मध्यलहरा उठा सारा संसारकहाँ तक निहारूं ?ह...
अनीता सैनी
19
   रिदम धड़कनों में  प्रति पहर  खनकती ,   राग-अनुराग का एहसास है ऐसा, सुर-सरगम सजा साँसों में संगीत अधरों पर,   शब्द-भावों ने पहना लिबास वीणा की धुन के जैसा |संयोग-वियोग के भँवर में गूँथी रागिनी, राग म...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
306
विजय राजबली माथुर
98
 ~विजय राजबली माथुर ©
Bhavna  Pathak
77
ब्रिगेडियर साहेब I, Bhavna could get hold of some pages from the memoirs of my Mamaji's writings and the same are reproduced here.   (स्वर्गीय पिताजी को समर्पित )गेस्ट राइटर : विजय चतुर्वेदी रात्रि के दस बजकर पचास मिनट हो रहे थे , दिसंबर का मह...
PRABHAT KUMAR
158
यह बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि अभी आज ही सांझा काव्य संग्रह की मेरी दूसरी पुस्तक मुझे कोरियर से प्राप्त हुई। इसके लिए उदीप्त प्रकाशन का आभारी हूँ। मैं अपने सभी करीबी साथियों, बड़ों और परिवारजनों का दिल से सहयोग बनाएं रखने के लिए शुक्रिया अदा कर...
 पोस्ट लेवल : कविता काव्य संगम
अमितेश कुमार
179
अभी तीन साल पहले जीवन और रंगमंच में 60 साल तक उनकी सहचर रहीं पत्नी फ्रांका रेमे का निधन हुआ था, और अब इस 13 अक्तूबर को इतालवी नाटककार दारियो फो भी 90 साल की उम्र में दुनिया को विदा कह गए। फो अपने जीते-जी रंगमंच में प्रतिरोध की बहुत बड़ी आवाज थे। उनके लिखे 80 नाटक द...
अमितेश कुमार
179
भारत रंग महोत्सव के होने के आशय और इसकी अंदरूनी तहों की अच्छी  पड़ताल की है संगम पांडेय ने. उनके सौजन्य से रंगविमर्श पर.यह भारत रंग महोत्सव का अठाहरवाँ साल था। सन 1999 में संस्कृति मंत्रालय की एक ग्रांट को उसी वित्तीय वर्ष में तुरत-फुरत खर्च करने के अभिप्...
अमितेश कुमार
179
जीवन के रंगमंच से शाहिद अनवर की भूमिका के असमय अंत ने रंगकर्मियों को व्यथित कर दिया. बिहार के सासाराम में जन्मे, और ज.ने.वि. को अपना कर्मक्षेत्र बनाने वाले शाहिद जिस दिन सुपुर्दे खाक हो रहे थे उसी दिन बेगूसराय (रंग-ए-माहौल) में उनके द्वारा अनुवादित नाटक ‘औरंगजेब’ क...
mahendra verma
276
घर कभी घर थे मगर अब ईंट पत्थर हो गए,रेशमी अहसास सारे आज खद्दर हो गए।वक़्त की रफ़्तार पहले ना रही इतनी विकट,साल के सारे महीने ज्यूं दिसंबर हो गए।शोर ये कैसा मचा है-सत्य मैं हूं, सिर्फ मैं,आदमी कुछ ही बचे हैं शेष ईश्वर हो गए।परख सोने की भला कैसे सही होगी मगर,जो ‘कसौट...