ब्लॉगसेतु

संतोष त्रिवेदी
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किसान घणे बावले हो रहे हैं।एक तो कोई मसला है ही नहीं फिर भी कोई बनता है तो आपसदारी से हम सुलटा लेंगे।वे बिला वजह इसे ‘इंटरनेशनल’ बनाने लग रहे हैं।हमारी सरकार शुरू से चाह रही है कि वो बात करें।बारह बार कर भी चुकी है।चौबीस बार और कर लेगी।बात करने से सरकार पीछे ना हट...
संतोष त्रिवेदी
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कहते हैं मुसीबत अकेले नहीं आती।एक ठीक से जा भी नहीं पाती कि दूसरी और ‘बेहतर’ तरीक़े से दबोच लेती है।पहले वायरस से बचने की मुसीबत थी फिर मुई वैक्सीन आ गई।कह रहे हैं कि पचास-पार वालों को पहले लगेगी।ये भी कोई बात हुई ! लगता है वायरस से तो बच गए पर इससे बचना मुश्किल है...
संतोष त्रिवेदी
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यह अच्छा ही हुआ कि हमारे यहाँ ‘लोकतंत्र के मंदिर’ के निर्माण की इजाज़त मिल गई।देश में लोकतंत्र का निबाह हो और उसका मंदिर न हो,यह निहायत बचकानी बात है।ऐसा नहीं है कि हमारे यहाँ पहले ‘लोकतंत्र का मंदिर’ था ही नहीं, पर लोकतंत्र की तरह वह भी बहुत पुराना हो गया है।कई बा...
संतोष त्रिवेदी
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नया साल आ गया है,साथ में नए संकल्प भी।जिसे देखो वही एक-दो संकल्प उठाए घूम रहा है।नए साल में कठिन से कठिन संकल्प लिए जाते हैं ताकि उनके पूरा न होने पर कम से कम ग्लानि का अनुभव हो।ढके और छुपे चेहरों से ग्लानि का कोई भाव वैसे भी नहीं दीखता।इससे यही ज़ाहिर होता है कि ए...
संतोष त्रिवेदी
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कोरोना जी के जाने की अभी तक कोई भनक हमारे कानों में नहीं आई पर उनके ‘सामाजिक’ होने को लेकर रोज़ नए रहस्य कान खा रहे हैं।एक ताज़ा शोध बताता है कि वायरस जी में ‘मिलनसारिता’ का नायाब गुण है।ये जिनकी देह में सक्रिय होते हैं,उसमें सामने वाले ‘देहधारी’ से मिलने की अजब बे...
संतोष त्रिवेदी
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अपना देश चुनाव-प्रिय देश है।आए दिन चुनाव होते रहते हैं पर जब ये बिहार में हों तो ख़ास बात हो जाती है।अब भले ही बूथ लूटने जैसी रोमांचक वारदातें बंद हो गईं हों पर मज़े के साथ वोट लूटने वाले क़िस्से अभी भी ख़ूब हैं।सबसे ज़्यादा चुटकुले वहीं से आयात होते हैं।अब्बै देखि...
संतोष त्रिवेदी
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मैं जन्मजात कवि हूँ।इस बात की गवाही मेरे पड़ोसी दे सकते हैं।पैदा होते ही जैसे तुलसी के मुँह से ‘राम’ निकला था,मेरे मुँह से ‘क्रांति’ निकली थी।मेरे करुण-क्रंदन से पूरा मुहल्ला रात भर जागता रहा।शुरू से ही मैं ‘जन-जागरण’ के काम में लग गया था।यहीं से मुझमें कविता के बी...
संतोष त्रिवेदी
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आदरणीय पूर्णकालिक,कार्यकारी,अंतरिम या ‘नॉन-वर्किंग’ अध्यक्ष जी ! इसमें जो भी संबोधन आपको लोकतांत्रिक लगे, ‘फिट’ कर लीजिएगा।सबसे पहले हम यह ‘किलियर’ किए दे रहे हैं कि यह वाली चिट्ठी पहले वाली जैसी बिलकुल नहीं है।इसे ‘जस्ट’ पिछली वाली को ‘कंडेम’ करने के लिए लिख रहे ह...
संतोष त्रिवेदी
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आजकल जिसे देखो,वही संघर्ष से ‘लैस’ दिखता है।सबके संघर्ष अलग-अलग हैं।जिसका जैसा क़द,वैसा संघर्ष।कुछ का संघर्ष महज़ पेट भरने के लिए होता है।वे जीवन भर यही करते हुए ख़र्च हो जाते हैं।किसी को प्रेरित तक नहीं कर पाते।जिसका पेट भरा होता है,वह और पैसे के लिए संघर्ष करता ह...
संतोष त्रिवेदी
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इन दिनों बड़ी अजब स्थिति में फँसा हूँ।महीनों घर से बाहर नहीं निकला तो सारी रुचियाँ ही बदल गईं।एक ज़माना था जब रेडियो की खबरें बड़े चाव से सुनता था।वे एक कान से टकराकर बड़े सुभीते से दूसरे कान से निकल लेती थीं।रात को नींद में घोड़े बेचता सो अलग।फिर इलेक्ट्रॉनिक-क्रा...