ब्लॉगसेतु

संतोष त्रिवेदी
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इन दिनों बड़ी अजब स्थिति में फँसा हूँ।महीनों घर से बाहर नहीं निकला तो सारी रुचियाँ ही बदल गईं।एक ज़माना था जब रेडियो की खबरें बड़े चाव से सुनता था।वे एक कान से टकराकर बड़े सुभीते से दूसरे कान से निकल लेती थीं।रात को नींद में घोड़े बेचता सो अलग।फिर इलेक्ट्रॉनिक-क्रा...
संतोष त्रिवेदी
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इधर कई दिनों से प्रधानसेवक जी के राष्ट्रीय-दर्शन नहीं हुए।वे जब भी दिखते हैं,अच्छा लगता है।वो जब बोलते हैं तो मंत्रमुग्ध होकर सुनता हूँ।क्या पता,तनिक चूक हो जाए और ज़िंदगी भर हाथ मलता रह जाऊँ ! देखिए न,नोटबंदी को गंभीरता से न लेने वाले आज तक भुगत रहे हैं।भ्रष्टाचार...
संतोष त्रिवेदी
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धीरे-धीरे सब कुछ खुल रहा है।लॉक-डाउन भी,वायरस भी और हम भी।पहले सरकार खुली फिर विपक्ष।वादों की तरह ‘हवाई-ट्रैक’ भी खुले।रेलगाड़ियाँ खुलीं तो उनके ड्राइवर भी खुल गए।जाना  था दूलापुर ,पहुँच गए दौलतपुर।आख़िर कोई कहाँ तक धीर धरे ! सरकार ने कई दिनों तक पिटारी खोली फ...
संतोष त्रिवेदी
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विद्वान कहते हैं कि उत्तम कोटि का साहित्य सन्नाटे में ही रचा जाता है।इसी को ध्यान में रखकर ‘वे’ निपट कोरोना-काल में फैले सन्नाटे से निपट रहे हैं।वे उम्दा क़िस्म के साधक रहे हैं।जब भी जैसी ज़रूरत होती है,साध लेते हैं।सन्नाटे से भरपूर समय में उन्होंने सैंतीस किताबें...
संतोष त्रिवेदी
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पिछले कई दिनों से ‘घरबंदी’ में हूँ।घर से बाहर निकलना तो दूर,बॉलकनी तक से झाँकने में डर लगता है।कहीं मुआ वायरस हवा में ही न दबोच ले ! इस अदृश्य दुश्मन का ख़ौफ़ है ही ऐसा कि फ़ोन से भी बात करते समय तीन फ़ीट की दूरी रखता हूँ।यहाँ तक कि डर के मारे सोशल मीडिया में नहीं...
संतोष त्रिवेदी
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होली से ठीक पहले शहर में शांति स्थापित हो गई।इसमें दंगों की ख़ास भूमिका रही।अगर ये बड़े पैमाने पर न हुए होते तो शहर में शांति स्थापित करने में व्यावहारिक दिक्कतें आतीं।अब सारा माहौल अमन और भाईचारे की चपेट में है।घर भले ही खंडहर में तब्दील हो गए हों,चैनलों में दिन-र...
संतोष त्रिवेदी
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साधक जी गहरे सदमे में थे।उनके प्रिय लेखक का निधन हो गया था और यह ख़बर उन्हें पूरे बत्तीस मिनट की देरी से मिली थी।अब तक तो सोशल मीडिया में कई लोग बाज़ी मार ले गए होंगे।यह उनकी अपूरणीय क्षति थी।फिर भी उन्होंने ख़ुद को संभाला।ऐसा करना ज़रूरी था नहीं तो क्षति और व्यापक...
संतोष त्रिवेदी
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राजधानी में सब कुछ बिलकुल सामान्य चल रहा था।कंटोप लगाए और गरम कोट पहने लोग सर्द मौसम की बातें कर रहे थे।तभी चुनाव आ गए।हर जगह अपने-अपने अलाव सुलगने लगे।कुछ दिन बीत जाने के बाद भी चुनावों में पर्याप्त गर्मी नहीं आ पा रही थी।बुद्धिजीवी शांति की अपीलें तक जारी&nb...
संतोष त्रिवेदी
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पुस्तक मेले में घुसते ही ‘वो’ दिखाई दिए।मैं कन्नी काटकर निकलना चाहता था पर उन्होंने पन्नी में लिपटी अपनी किताब मुझे पकड़ा दी।फिर फुसफुसाते हुए बोले, ‘अब आए हो तो विमोचन करके ही जाओ।तुम मेरे आत्मीय हो।आपदा में अपने ही याद आते हैं।’ ऐसा कहते हुए वे मुझे साहित्य में उ...
संतोष त्रिवेदी
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इन दिनों ‘लोकतंत्र’ और ‘सत्य’ लगातार खबरों में बने हुए हैं।इससे इस बात की पुष्टि भी होती है कि ये दोनों अभी तक जीवित हैं।यह इस सबके बावजूद हुआ जबकि हर दूसरे दिन ‘लोकतंत्र की हत्या’ होने की मुनादी पिटती है।पर यह सशक्त लोकतंत्र का कमाल ही है कि वह अगले दिन सही-सलामत...