ब्लॉगसेतु

संतोष त्रिवेदी
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चित्रगुप्त बेहद चिंतित नज़र आ रहे थे।बार-बार बहीखाता झाँक रहे थे।चेहरे पर मंदी का असर साफ़ दिख रहा था।भारतवर्ष की सड़कों से आत्माओं की आवक अचानक कम हो गई थी।अभी तक सबसे अधिक आपूर्ति वहीं से हो रही थी।‘ऐसा क्या हुआ कि मौत के सेक्टर में भी मंदी आ गई ? आदमी...
संतोष त्रिवेदी
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इधर लगातार बुरी ख़बरें आ रही थीं।वे बड़ी उम्मीद से बैठे थे पर उनका दिल बैठा जा रहा था।बार-बार वे घटनास्थल की ओर ताक रहे थे,पर उनके सिवा कुछ भी ‘घट’ नहीं रहा था।वे हर चैनल से जुड़े हुए थे।रिमोट को लगातार घुमा रहे थे,पर उनका सिर घूमने लगा।‘अनार-बाग़’ से एक ‘अनार’ तक...
संतोष त्रिवेदी
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मैं ‘नए भारत’ का ‘नया धार्मिक’ हूँ।अपने धर्म को लेकर मेरी धारणा इतनी मज़बूत है कि धर्म भले ढह जाए,धारणा को रत्ती-भर खरोंच नहीं आ सकती।वैचारिक होना अब एक दक़ियानूसी मामला है।इसमें समय-समय पर व्यक्ति के फिसलने का ख़तरा बना रहता है।जबसे मैंने नई तरह का धर्म धारण किया...
संतोष त्रिवेदी
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हमें झूठे लोग बेहद पसंद हैं।वे बड़े निर्मल-हृदय होते हैं।कभी भी अपने झूठे होने का घमंड नहीं करते।ये तो सच्चे लोग हैं जो अपनी सच्चाई की डींगें मारते फिरते हैं।झूठा अपने झूठे होने का स्वाँग नहीं करता।खुलकर और पूरे होशो-हवास में बोलता है।वह ख़ुद इस बात का प्रचार नहीं...
संतोष त्रिवेदी
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उधर जैसे ही विश्व-कप में हमारे खिलाड़ियों के उम्दा प्रदर्शन की ख़बर विलायत से आई,इधर देश के अंदर छुपे होनहार ‘खिलाड़ी’ छटपटा उठे।उन्हें अपने हुनर को आजमाने का अच्छा अवसर दिखाई दिया।हमारे यहाँ राजनीति का क्षेत्र कभी भी प्रतिभा-शून्य नहीं रहा।जब भी लगा कि देश ‘ग़लत’...
संतोष त्रिवेदी
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जैसे शादी के सारे गीत सच्चे नहीं होते,वैसे ही चुनाव-पूर्व लिए गए सारे संकल्प झूठे नहीं होते।चुनाव बाद एकाध संकल्प यदि सच्चा निकल जाए तो समझिए जनता की लॉटरी लग गई।चुनाव से पहले जिस मज़बूत निष्ठा से विरोधी को निपटाना होता है,परिणाम उलट होने पर श्रद्धापूर्वक वही सहयोग...
संतोष त्रिवेदी
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एक निरा राजनैतिक समय में मेरा मन अचानक साहित्यिक होने के लिए मचल उठा।राजनीति में रहते हुए भी अपन हमेशा ‘अराजक’ रहे।कभी खुलकर नहीं आए।खुलने के अपने ख़तरे होते हैं।राजनीति में भी,साहित्य में भी।एकदम से खुलना कइयों को खलने लगता है।सत्ता और राजनीति में चुप रहकर ही रसपा...
संतोष त्रिवेदी
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महासमर शुरू हो चुका है।सभी योद्धा हुंकार भर रहे हैं।युद्धभूमि रक्त की नहीं ‘मत’ की प्यासी लग रही है।कुशल सेनापति अग्रिम मोर्चे पर डट चुके हैं।उनके तूणीर नुकीले,नशीले और ज़हरीले तीर   उगल रहे हैं।इरादे बता रहे हैं कि हर तरह के वादे उनके पास जमा हैं।इन्हीं को गो...
संतोष त्रिवेदी
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चुनाव आते,उसके पहले होली आ गई।मतलब नेताओं को ही नहीं जनता को भी मज़ाक़ करने की छूट मिल गई है।चुनाव में भले आचार-संहिता लागू हो गई हो,होली में कोई संहिता नहीं चलती।कोई किसी पर कितना भी कीचड़ पोते,वह बुरा नहीं मानता।होली ही ऐसा मौक़ा है जब दाग़ भी अच्छे लगते हैं।चुना...
संतोष त्रिवेदी
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सम्मान-समिति की पहले से ‘फ़िक्स’ बैठक शहर के एक अज्ञात स्थान पर रखी गई।उद्देश्य यह था कि साहित्य में हो रही लगातार गिरावट को इसके ज़रिए उठाया जाय।इसके लिए ज़रूरी था कि इस बात की ठीक ढंग से तलाश की जाय कि किसको उठाने से कितने लोग गिरेंगे।शहर की नामी इनामी संस्था ने...