ब्लॉगसेतु

संतोष त्रिवेदी
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पुस्तक मेले में घुसते ही ‘वो’ दिखाई दिए।मैं कन्नी काटकर निकलना चाहता था पर उन्होंने पन्नी में लिपटी अपनी किताब मुझे पकड़ा दी।फिर फुसफुसाते हुए बोले, ‘अब आए हो तो विमोचन करके ही जाओ।तुम मेरे आत्मीय हो।आपदा में अपने ही याद आते हैं।’ ऐसा कहते हुए वे मुझे साहित्य में उ...
संतोष त्रिवेदी
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इन दिनों ‘लोकतंत्र’ और ‘सत्य’ लगातार खबरों में बने हुए हैं।इससे इस बात की पुष्टि भी होती है कि ये दोनों अभी तक जीवित हैं।यह इस सबके बावजूद हुआ जबकि हर दूसरे दिन ‘लोकतंत्र की हत्या’ होने की मुनादी पिटती है।पर यह सशक्त लोकतंत्र का कमाल ही है कि वह अगले दिन सही-सलामत...
संतोष त्रिवेदी
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चिट्ठी लिखी गई पर पराली वाला मौसम देखकर शरमा गई।सरकार बिलकुल बनते-बनते रह गई।सबसे बड़ी तकलीफ़देह बात तो यह रही कि लड्डुओं ने पेट में पचने से ही इंकार कर दिया।खाने के बाद पता चला कि वे ग़लत पेट में चले गए।अब समस्या सरकार बनाने से ज़्यादा लड्डुओं को पचाने की हो गई।वे...
संतोष त्रिवेदी
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वे ऊँचे दर्ज़े के आलोचक हैं।हमेशा ऊँचाई में रहते हैं।गोष्ठियों में जाते हैं तो भी ऊँचे दर्ज़े में सफ़र करते हैं।मंच से बोलते समय अपनी ऊँचाई बनाए रखते हैं।साहित्य को ऊँचा ‘उठाने’ में उनका विशेष योगदान है।उन्हीं के सदप्रयासों से साहित्य आज भलीभाँति फल-फूल रहा है।वे त...
संतोष त्रिवेदी
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सोना नींद हराम केहेरुपिया ख़ूनु निकारे है।बड़की बातैं सब हवा हुईं,जीडीपी बादरु फारे है।गै लूटि तिजोरी बंकन कैखीसा पूरा अउ झारि दिहेनबैपारी पैकेज चाँटि रहे,लरिकउना पेटु उघारे है।करिया-धनु एकदम गा बिलायअब तौ बिकास चुचुहाय रहा।टिलियन डॉलर बसि आवति हैंनिम्मो दीदी समुझा...
संतोष त्रिवेदी
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अनमने सब, जी नहीं बहला हुआ।इस शहर में यह नया मसला हुआ।आदमी है वो भी मेरी ही तरहअब लगे है रोज़ वह बदला हुआ।तुम भी इक दिन जान जाओगे उसेशख्स वह चुप है अभी दहला हुआ।मान और सम्मान भी बिकने लगानारियल और शॉल में घपला हुआ।गर्दनें सबकी झुकी हैं सामनेइस जहाँ में बादशा पहला ह...
संतोष त्रिवेदी
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चित्रगुप्त बेहद चिंतित नज़र आ रहे थे।बार-बार बहीखाता झाँक रहे थे।चेहरे पर मंदी का असर साफ़ दिख रहा था।भारतवर्ष की सड़कों से आत्माओं की आवक अचानक कम हो गई थी।अभी तक सबसे अधिक आपूर्ति वहीं से हो रही थी।‘ऐसा क्या हुआ कि मौत के सेक्टर में भी मंदी आ गई ? आदमी...
संतोष त्रिवेदी
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इधर लगातार बुरी ख़बरें आ रही थीं।वे बड़ी उम्मीद से बैठे थे पर उनका दिल बैठा जा रहा था।बार-बार वे घटनास्थल की ओर ताक रहे थे,पर उनके सिवा कुछ भी ‘घट’ नहीं रहा था।वे हर चैनल से जुड़े हुए थे।रिमोट को लगातार घुमा रहे थे,पर उनका सिर घूमने लगा।‘अनार-बाग़’ से एक ‘अनार’ तक...
संतोष त्रिवेदी
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मैं ‘नए भारत’ का ‘नया धार्मिक’ हूँ।अपने धर्म को लेकर मेरी धारणा इतनी मज़बूत है कि धर्म भले ढह जाए,धारणा को रत्ती-भर खरोंच नहीं आ सकती।वैचारिक होना अब एक दक़ियानूसी मामला है।इसमें समय-समय पर व्यक्ति के फिसलने का ख़तरा बना रहता है।जबसे मैंने नई तरह का धर्म धारण किया...
संतोष त्रिवेदी
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हमें झूठे लोग बेहद पसंद हैं।वे बड़े निर्मल-हृदय होते हैं।कभी भी अपने झूठे होने का घमंड नहीं करते।ये तो सच्चे लोग हैं जो अपनी सच्चाई की डींगें मारते फिरते हैं।झूठा अपने झूठे होने का स्वाँग नहीं करता।खुलकर और पूरे होशो-हवास में बोलता है।वह ख़ुद इस बात का प्रचार नहीं...